
New Delhi, 30 जुलाई . India में क्रिटिकल मिनरल की मांग 2047 तक चार से दस गुना तक बढ़ सकती है. इसकी वजह Government की ओर से 2030 तक 500 गीगावाट की गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता हासिल करने का लक्ष्य और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ाने की दिशा में उठाए जा रहे कदम हैं. यह जानकारी Thursday को जारी रिपोर्ट में दी गई.
ग्रांट थॉर्नटन India की रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी इकोसिस्टम के तेजी से विस्तार के चलते लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, ग्रेफाइट, तांबा और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की मांग में तेज बढ़ोतरी होने की उम्मीद है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि अकेले ईवी बैटरियों की मांग 2030 तक 110–130 गीगावाट तक पहुंच सकती है. वहीं, India के 2070 तक नेट जीरो लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने के साथ क्रिटिकल मिनरल की मांग चार से दस गुना तक बढ़ सकती है.
रिपोर्ट के अनुसार, India को केवल खनिज संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि एक्सप्लोरेशन, रिफाइनिंग, प्रोसेसिंग, रीसाइक्लिंग और फंडिंद जैसे क्षेत्रों में मजबूत घरेलू क्षमताएं भी विकसित करनी होंगी.
रिपोर्ट में ‘विकसित India 2047’ के विजन के अनुरूप लक्षित नीतिगत सुधारों, रणनीतिक निवेश और वैश्विक साझेदारियों के माध्यम से वर्ष 2047 तक के लिए तीन चरणों वाला रोडमैप प्रस्तुत किया गया है.
पहला चरण 2026–31 के दौरान बुनियादी ढांचा तैयार करने का है, जिसमें एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (ईपीआर), सर्कुलर मिनरल प्रोसेसिंग जोन तथा बैटरी ट्रेसबिलिटी और रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन शामिल हैं.
दूसरे चरण (2031–36) में रीसाइक्लिंग और ट्रेसबिलिटी प्रणालियों का विस्तार तथा ग्रीन फाइनेंसिंग को बढ़ावा देकर औद्योगिकीकरण को गति देने की बात कही गई है.
तीसरे चरण (2036–47) में रणनीतिक आत्मनिर्भरता हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि आयात पर निर्भरता कम हो, घरेलू रिफाइनिंग और रीसाइक्लिंग क्षमता मजबूत बने तथा 10–15 अरब डॉलर की वार्षिक रीसाइक्लिंग अर्थव्यवस्था विकसित की जा सके.
रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि महत्वपूर्ण खनिजों से जुड़ी नीतियों का फोकस राजस्व अधिकतम करने के बजाय संसाधन सुरक्षा पर होना चाहिए. इसके लिए अन्वेषण-आधारित आवंटन को बढ़ावा देने, खनिज-विशिष्ट रणनीतियां अपनाने और घरेलू स्तर पर वैल्यू एडिशन को अनिवार्य बनाने की जरूरत बताई गई है.
अन्य प्राथमिकताओं में घरेलू रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग क्षमताओं को मजबूत करना, मंजूरियों की प्रक्रिया में तेजी लाना, राजकोषीय ढांचे को अधिक व्यावहारिक बनाना तथा डाउनस्ट्रीम मैन्युफैक्चरिंग को समर्थन देना शामिल है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि विशेष रूप से रिफाइनिंग, सेपरेशन और रीसाइक्लिंग अत्यधिक कैपिटल-इंटेंसिव क्षेत्र हैं, जिनमें निवेश की वापसी में लंबा समय लगता है. इसलिए बहु-स्तरीय वित्तपोषण व्यवस्था अपनाने की सिफारिश की गई है, जिसमें अन्वेषण के लिए Governmentी सहायता, सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड, राजकोषीय प्रोत्साहन, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई), वेंचर कैपिटल, गारंटी-समर्थित वाणिज्यिक बैंक वित्तपोषण और बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों से फंडिंग शामिल हो.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हालांकि राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन (एनसीएमएम) के लिए 34,300 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, लेकिन मूल्य श्रृंखला के उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों के लिए अधिक लक्षित वित्तपोषण तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है.
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एबीएस