
New Delhi, 4 मई . India की राजनीति में कभी मजबूत पकड़ रखने वाली वामपंथी पार्टियां अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ी हैं, जहां पहली बार 50 से ज्यादा सालों में उनके पास किसी भी राज्य की सत्ता नहीं रहने की संभावना बनती दिख रही है. ताजा चुनावी रुझान इसी ओर इशारा कर रहे हैं. खासकर केरल के रुझानों को देखकर यह संभावना और मजबूत हो गई है.
साल 1996 में सीपीआई-एम के दिग्गज नेता ज्योति बसु, जो उस समय तक पश्चिम बंगाल के Chief Minister के रूप में करीब दो दशक पूरे कर चुके थे, देश के Prime Minister बनने के बेहद करीब पहुंच गए थे. यूनाइटेड फ्रंट Government के तहत उन्हें यह प्रस्ताव मिला था लेकिन उनकी पार्टी के पोलित ब्यूरो ने इसे ठुकरा दिया. बाद में खुद ज्योति बसु ने इसे ‘ऐतिहासिक भूल’ बताया था.
साल 2008 तक वामपंथी दल राष्ट्रीय राजनीति में भी काफी प्रभावशाली थे. उस समय मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस की Government (यूपीए) संसद में वाम दलों के समर्थन पर टिकी थी लेकिन भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के मुद्दे पर वाम दलों ने Government से समर्थन वापस ले लिया, जिससे Government को विश्वास मत का सामना करना पड़ा. उस दौर में वामपंथी दल पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा, तीन राज्यों में सत्ता में थे और Lok Sabha में भी उनकी अच्छी-खासी मौजूदगी थी.
अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. पिछले कुछ वर्षों में मतदाताओं का झुकाव केंद्र-दक्षिणपंथी दलों की ओर बढ़ा है, जिससे वामपंथी दलों का प्रभाव लगातार घटता गया है. केरल में मौजूदा रुझानों के अनुसार, Chief Minister पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) सत्ता से बाहर होती दिख रही है. अगर ऐसा होता है, तो करीब 1970 के बाद यह पहली बार होगा जब देश के किसी भी राज्य में वाम दलों की Government नहीं होगी.
हालांकि India में वाम राजनीति का इतिहास काफी समृद्ध रहा है. देश के पहले आम चुनाव (1951-52) में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी संसद में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनकर उभरी थी. इसके कुछ साल बाद 1957 में केरल में दुनिया की पहली लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई कम्युनिस्ट Government बनी, जो अपने आप में ऐतिहासिक घटना थी.
1970 के दशक के अंत में वाम दलों का स्वर्णकाल शुरू हुआ. 1977 में पश्चिम बंगाल में सीपीआई-एम के नेतृत्व में लेफ्ट फ्रंट ने सत्ता हासिल की और इसके बाद वहां सबसे लंबा लगातार शासन चला. ज्योति बसु ने 23 साल तक Chief Minister रहकर रिकॉर्ड बनाया और 2000 में उन्होंने बुद्धदेव भट्टाचार्य को जिम्मेदारी सौंपी. 2011 तक वाम दलों का बंगाल पर कब्जा बना रहा.
त्रिपुरा भी वामपंथ का मजबूत गढ़ रहा. 1993 से लेकर कई चुनावों तक लेफ्ट फ्रंट ने लगातार जीत हासिल की. माणिक Government जैसे नेता करीब 20 साल तक Chief Minister रहे और स्थिर शासन का उदाहरण बने.
पिछले एक दशक में वाम दलों का पतन तेजी से शुरू हुआ. 2011 में पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और सिंगूर जैसे मुद्दों पर जनता के असंतोष ने ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के लिए रास्ता साफ कर दिया. इसके बाद वाम दलों की ताकत तेजी से घटती गई.
इसके बाद वाम दलों की मौजूदगी मुख्य रूप से केरल तक सीमित रह गई. 2014 में केंद्र में भाजपा के उभार के बाद, 2018 में त्रिपुरा में भी वामपंथी किला ढह गया. 60 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा ने 36 सीटें जीत लीं और वाम दलों की सीटें 50 से घटकर 16 रह गईं.
केरल वाम दलों का आखिरी मजबूत गढ़ बचा. 2016 में पिनाराई विजयन के नेतृत्व में वाम मोर्चा सत्ता में लौटा और 2021 में लगातार दूसरी बार जीत दर्ज कर परंपरा को तोड़ा. इससे वामपंथ को कुछ समय के लिए नई ऊर्जा मिली.
अब केरल से आ रहे ताजा रुझान एक बार फिर चिंता बढ़ा रहे हैं. कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ज्यादातर सीटों पर बढ़त बनाए हुए है, जिससे सत्ता परिवर्तन की संभावना मजबूत हो गई है.
तिरुवनंतपुरम में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जश्न मनाना भी शुरू कर दिया है, जो उनकी जीत के प्रति विश्वास को दिखाता है. अगर ये रुझान नतीजों में बदलते हैं, तो यह वाम राजनीति के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ होगा. ऐसे में पहली बार वाम दलों के पास किसी भी राज्य की सत्ता नहीं होगी.
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वीकेयू/पीएम