भारत बंद का केरल में व्यापक असर, माकपा से जुड़ी कुछ इकाइयां खुली रहीं

तिरुवनंतपुरम, 12 फरवरी . Thursday को आयोजित India बंद का देश के कई हिस्सों में सीमित असर देखने को मिला, लेकिन केरल में जनजीवन लगभग ठप हो गया. हालांकि, राज्य में कुछ स्थानों पर माकपा (सीपीआई(एम)) से जुड़ी इकाइयों के खुले रहने की खबरों ने विवाद को जन्म दे दिया.

राज्य के विभिन्न जिलों में दुकानें बंद रहीं और सार्वजनिक परिवहन सेवाएं पूरी तरह से निलंबित रहीं. केएसआरटीसी और निजी बसें सड़कों से नदारद रहीं, जबकि केवल कुछ निजी वाहन, मुख्य रूप से दोपहिया, ही सड़कों पर दिखाई दिए.

वायनाड जिले के कालपेट्टा, बाथेरी और मनंतवाडी जैसे कस्बों में वामपंथी और कांग्रेस कार्यकर्ता वाहनों को रोकते नजर आए. कालपेट्टा में आईएनटीयूसी कार्यकर्ताओं और एक मालवाहक ट्रक चालक के बीच कहासुनी भी हुई. एक निजी बैंक ने कामकाज शुरू करने की कोशिश की, लेकिन एआईटीयूसी कार्यकर्ताओं ने उसे बंद करा दिया.

इसी बीच मनंतवाडी से आई खबरों ने विवाद खड़ा कर दिया. यहां सीपीआई(एम) क्षेत्र समिति के एक सदस्य के स्वामित्व वाली फैक्ट्री सामान्य रूप से चलती रही, जहां लगभग 100 कर्मचारी काम पर मौजूद थे. यह मामला इसलिए भी चर्चा में आया क्योंकि आरोप लगे कि वायनाड के अन्य हिस्सों में खुले प्रतिष्ठानों को पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा जबरन बंद कराया गया.

इस घटना ने केरल की ‘बंद संस्कृति’ को लेकर लंबे समय से चली आ रही आलोचनाओं को फिर से हवा दे दी है. आलोचकों का कहना है कि बंद के आह्वान अक्सर दैनिक मजदूरों, छोटे व्यापारियों और आम यात्रियों पर प्रतिकूल असर डालते हैं, जबकि देश के अन्य हिस्सों में गतिविधियां सामान्य बनी रहती हैं.

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने बिना किसी विशेष घटना का जिक्र किए इसे “दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना” बताया कि India बंद प्रभावी रूप से “केरल बंद” बन गया. उन्होंने कहा कि राज्य बार-बार संगठित समूहों द्वारा आम जनता पर बंद थोपे जाने का शिकार होता है.

विपक्ष के नेता वी.डी. सतीशन ने भी इस तरह के बंद के दौरान सामान्य जीवन और आजीविका पर पड़ने वाले असर को लेकर नाराजगी जताई. उन्होंने कहा कि Political विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन यह नागरिकों के काम करने और स्वतंत्र रूप से आने-जाने के अधिकार की कीमत पर नहीं होना चाहिए.

देश के अन्य राज्यों में सामान्य गतिविधियां जारी रहने के बीच केरल में व्यापक बंद ने एक बार फिर विरोध के तरीकों और Political अभिव्यक्ति व जनसुविधा के बीच संतुलन पर बहस को तेज कर दिया है.

डीएससी

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