नेपाल में चुनावी हार के बाद पूर्व मधेश अलगाववादी नेता सीके राउत ने राजनीति छोड़ने का किया ऐलान

काठमांडू, 16 मार्च . नेपाल में हाल ही में हुए संसदीय चुनावों में करारी हार के बाद मधेश केंद्रित जनमत पार्टी के अध्यक्ष सीके राउत ने संसदीय राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर दी है.

दक्षिणी तराई क्षेत्र के मधेश की पहचान की राजनीति करने वाली किसी भी क्षेत्रीय पार्टी को इस बार फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (एफपीटीपी) प्रणाली के तहत एक भी सीट नहीं मिली. वहीं, आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली में भी इन दलों को आवश्यक तीन प्रतिशत वोट नहीं मिल सके, जिसके कारण वे प्रतिनिधि सभा में कोई प्रतिनिधि नहीं भेज पाए.

नेपाल की 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में 165 सदस्य एफपीटीपी प्रणाली से चुने जाते हैं, जबकि 110 सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के जरिए आते हैं.

स्थानीय प्राइम टेलीविजन को दिए साक्षात्कार में राउत ने कहा कि उन्होंने व्यक्तिगत इच्छा के विरुद्ध चुनाव लड़ा था और अब भविष्य में संसदीय चुनाव नहीं लड़ेंगे. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पार्टी को उनकी जरूरत रहने तक वह जनमत पार्टी का नेतृत्व करते रहेंगे.

राउत ने 2022 में अलगाववादी गतिविधियों को छोड़कर संसदीय राजनीति में प्रवेश किया था. लेकिन 5 मार्च को हुए चुनाव में सप्तरी-2 सीट से उन्हें रामजी यादव ने हराया, जो राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के उम्मीदवार थे. इस सीट पर राउत वोटों के लिहाज से तीसरे स्थान पर रहे.

2022 के चुनाव में जनमत पार्टी ने छह सीटें जीतकर राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल किया था. लेकिन इस बार क्षेत्रीय मधेशी दलों को भारी नुकसान उठाना पड़ा और 1991 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है जब नेपाल की निचली सदन में इन दलों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं होगा.

मधेश प्रांत की 32 एफपीटीपी सीटों में से आरएसपी ने 30 सीटें जीत लीं. नेपाली कांग्रेस और नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) को एक-एक सीट मिली.

दरअसल, चुनाव के दौरान बालेन शाह ने मैथिली में भाषण देते हुए खुद को “मधेश का बेटा” बताया और मतदाताओं से अपील की कि नेपाल को पहला मधेशी Prime Minister देने के लिए आरएसपी को वोट दें. उनका यह दांव कारगर साबित हुआ और आरएसपी ने मधेश क्षेत्र में बड़ी जीत दर्ज की.

मधेश केंद्रित दल 2007 के मधेश आंदोलन के बाद नेपाल की राजनीति में उभरे थे और 2008 के संविधान सभा चुनाव में उनकी मजबूत मौजूदगी रही थी. हालांकि बाद के चुनावों में अंदरूनी मतभेद और सत्ता राजनीति के आरोपों के कारण उनका प्रभाव धीरे-धीरे घटता गया.

इस चुनाव में अन्य प्रमुख मधेशी नेताओं को भी हार का सामना करना पड़ा. उपेंद्र यादव (जनता Samajwadi Party नेपाल) सप्तरी-3 से हार गए, जबकि रौतहट-3 से आम जनता पार्टी के प्रभु साह और सरलााही-2 से राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी के राजेंद्र महतो भी चुनाव नहीं जीत सके.

हालांकि मधेशी दलों का कहना है कि चुनावी हार के बावजूद मधेश के मुद्दे खत्म नहीं होंगे और वे भविष्य में फिर मजबूती से वापसी करेंगे.

डीएससी

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