‘स्थिर पृथ्वी और कल्याणकारी, निर्बाध आकाशरूपी आधार का आश्रय लें’, पीएम मोदी ने साझा किया सुभाषित

New Delhi, 22 सितंबर . Prime Minister Narendra Modi की ओर से Tuesday को social media प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर सुख और मंगल का संदेश देते हुए सुभाषित साझा किया गया. उन्होंने एक संस्कृत श्लोक के माध्यम से पापरहित और शुभ मार्ग पर चलने का संदेश दिया है.

Prime Minister की ओर से संस्कृत श्लोक, “सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम्. दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥” साझा किया गया है, जिसका हिंदी भावार्थ है कि मनुष्य उत्तम संरक्षण करने वाली, स्थिर पृथ्वी और कल्याणकारी, निर्बाध आकाशरूपी आधार का आश्रय लें. पापरहित होकर, शुभ मार्ग से ले जाने वाली, उत्तम चप्पुओं से युक्त दिव्य नौका के समान कल्याणकारी साधनों का आश्रय लेकर सुख और मंगल को प्राप्त करें.

Prime Minister की ओर से मुख्य रूप से ऋग्वेद के 10वें मंडल के 63वें सूक्त का 10वां मंत्र साझा किया गया है. यह मंत्र अथर्ववेद और शुक्ल यजुर्वेद में भी मिलता है. यह शुक्ल यजुर्वेद (अध्याय 21, मन्त्र 6) में भी आता है. इस मंत्र के माध्यम से “स्वस्ति-वाचन” या कल्याण की प्रार्थना की गई है.

इस मन्त्र के माध्यम से देवताओं की स्तुति और जीवन-यात्रा की निर्विघ्न समाप्ति के लिए प्रार्थना की जाती है. इसमें मानव जीवन की तुलना एक समुद्र यात्रा से की गई है और ईश्वर (या दिव्य शक्तियों) से एक ऐसी सुरक्षित नौका (नाव) प्रदान करने की प्रार्थना की गई है जो जीवन रूपी सागर से पार लगा सके.

इस मन्त्र के माध्यम से ऋषि देवताओं से प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! यह संसार एक अथाह सागर की तरह है, जिसमें सुख-दुख, उतार-चढ़ाव और कठिनाइयों का तूफान आता रहता है. इस संसार-सागर को पार करने के लिए हमें एक ऐसी दिव्य नौका (नाव) की आवश्यकता है जो ‘सुरक्षित, अविनाशी, सुन्दर पतवारों वाली और कल्याणकारी’ हो.

इस मंत्र के माध्यम से देवताओं से प्रार्थना की गई है कि जो हर प्रकार के संकटों से हमारी रक्षा करे, जिसमें अज्ञान या पाप का कोई छेद न हो, जिससे वह बीच मंझधार में न डूबे, जिसके पास सत्य, धर्म और सदाचार रूपी अच्छे चप्पू (पतवार) हों, ताकि जीवन सही दिशा में आगे बढ़ सके और जो हमें परम शांति और आनंद की ओर ले जाए.

इस मंत्र के माध्यम से ऋषियों का कहना है कि हम स्वयं को भी पापरहित बनाएं, क्योंकि पवित्र मन वाला व्यक्ति ही इस दिव्य नौका (ज्ञान, भक्ति, और सत्कर्म) पर बैठने का अधिकारी होता है. ईश्वर की कृपा और श्रेष्ठ बुद्धि ही वह नौका है, जिस पर बैठकर मनुष्य अपने जीवन को सफल बना सकता है और बिना किसी बाधा के मोक्ष या परम कल्याण (स्वस्ति) को प्राप्त कर सकता है.

एसडी/पीएम

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