सीजेपी और छात्र आंदोलन एक बड़ी पहेली का छोटा सा हिस्सा: सैम पित्रोदा (आईएएनएस एक्सक्लूसिव)

New Delhi, 15 अक्टूबर . इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के प्रमुख सत्यनारायण (सैम) पित्रोदा ने Thursday को कहा कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) और छात्र आंदोलन एक बड़ी Political और सामाजिक तस्वीर का ही हिस्सा हैं. उन्होंने तर्क दिया कि ये मुद्दे शासन-व्यवस्था और असमानता को लेकर चल रही व्यापक बहस का ही एक हिस्सा भर हैं.
से खास बातचीत में पित्रोदा ने कहा, “सीजेपी के बारे में बात करने से पहले, हमें यह समझना होगा कि देश में चल क्या रहा है? सीजेपी और छात्र आंदोलन एक बड़ी पहेली के बस कुछ हिस्से हैं. ये इकलौते हिस्से नहीं हैं. मेरी नजर में, एक ही समय में कई चीजें हो रही हैं, जो कई अलग-अलग मुद्दों को एक साथ जोड़ रही हैं.”
उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी चिंता ‘लोकतंत्र पर हमले’ को लेकर है. उन्होंने संस्थानों, नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी), मीडिया की आजादी और सत्ता के एक ही जगह पर केंद्रित होने को लेकर फिक्र जाहिर की.
कांग्रेस नेता ने कहा, “विभिन्न लोग इसे अलग-अलग नजरिए से देख सकते हैं, लेकिन जब आप संस्थानों पर कब्जा करने लगते हैं, नागरिक समाज को कमजोर करते हैं, मीडिया को नियंत्रित करते हैं, और एक तानाशाह सोच के साथ आगे बढ़ते हैं—जहां सब कुछ Prime Minister कार्यालय (पीएमओ), Prime Minister या जिसे ‘डबल-इंजन Government’ कहा जाता है, उसके द्वारा तय किया जाता है—तो लोकतंत्र पर कई तरह से हमले होते हैं.”
पित्रोदा ने दावा किया कि लोग अब अलग राय रखने से डरने लगे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी बात सुनी नहीं जाएगी या उन पर कार्रवाई हो सकती है—जैसे कि Enforcement Directorate (ईडी) की जांच या अदालती मामले.
उन्होंने चुनावी पारदर्शिता को लेकर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि वोटर रजिस्ट्रेशन, पात्रता, वोटों की गिनती, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम), वोटर लिस्ट और मतपेटियों (बैलेट बॉक्स) को संभालने के तरीकों को लेकर लगे आरोपों और संदेहों ने जनता के बीच अविश्वास पैदा किया है.
उन्होंने कहा, “एक तरफ तो यह लोकतंत्र पर हमला है; दूसरी तरफ, कई लोगों का मानना है कि चुनाव निष्पक्ष नहीं थे. मैंने (लोगों ने) जो वोट डाला, उसे गिना ही नहीं गया. चाहे वह रजिस्ट्रेशन हो, मेरी योग्यता हो, वोटों की गिनती हो, ईवीएम का इस्तेमाल हो, वोटर लिस्ट हो, या फिर मतपेटियों को इधर-उधर ले जाना, उन्हें ताला लगाना, सड़क पर खोलना या ट्रक में फेंक देना हो—इन सबने अविश्वास पैदा किया है. अब मुझे (आम वोटर्स) इस पर कोई भरोसा नहीं रहा.”
पित्रोदा ने माना कि इन आरोपों पर लोगों की अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन उन्होंने कहा कि अब मुद्दों पर निष्पक्ष चर्चा के बजाय आरोप-प्रत्यारोप व्यक्तिगत हमलों में बदल गया है.
उन्होंने बताया कि सीजेपी आंदोलन तब शुरू हुआ जब छात्रों के एक समूह को ‘कॉकरोच’ (तिलचट्टे) कहे जाने से बहुत ठेस पहुंची और वे एकजुट हो गए. उनके अनुसार, परीक्षा से जुड़ी समस्याओं, पेपर लीक, खराब बुनियादी ढांचे, शिक्षा की गुणवत्ता, बढ़ती ट्यूशन फीस, कोचिंग सेंटरों के बढ़ते प्रभाव और बेरोजगारी को लेकर चिंताओं के बीच उनके विरोध प्रदर्शन ने जोर पकड़ लिया.
उन्होंने कहा, “इन मुद्दों का असर अगली पीढ़ी पर पड़ता है और इसने युवाओं को वास्तव में प्रेरित किया. इसका नतीजा यह हुआ कि वे निडर हो गए, उनमें साहस आया और वे खुलकर अपनी बात रख सके.”
विरोध प्रदर्शनों के दौरान अभद्र भाषा के इस्तेमाल पर हुए विवाद का जिक्र करते हुए, पित्रोदा ने कहा कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने ऊंची आवाज में बात की या अनुचित भाषा का इस्तेमाल किया, जिसे गुस्से को जाहिर करने का तरीका कहा जा सकता है. हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि वे इस तरह के व्यवहार का समर्थन नहीं करते हैं.
उन्होंने आगे कहा कि जो लोग पहले बोलने से डरते थे, वे अब अपनी राय रख रहे हैं, जिससे नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) में एक उम्मीद जगी है.
पित्रोदा ने सीजेपी आंदोलन को निडर विरोध, साहस और जागरूकता से जुड़ा बताया. अपने लिखे एक लेख का हवाला देते हुए, उन्होंने इस आंदोलन की तुलना ‘अरब स्प्रिंग’ से की और इसे ‘इंडियन मॉनसून’ का नाम दिया. उन्होंने इस पहल की शुरुआत करने का श्रेय युवाओं को दिया.
पित्रोदा ने वेतन में ठहराव, बढ़ती महंगाई और घटती क्रय शक्ति (खरीदने की क्षमता) को असमानता, अन्याय और आर्थिक अवसरों की कमी से जुड़ी चिंताएं बताया. उन्होंने कहा कि छात्र आंदोलन ने इन समुदायों को यह विश्वास दिलाया है कि वे भी अपनी आवाज उठा सकते हैं.
उन्होंने बताया कि चौथा मुद्दा Government के कामकाज से जुड़ा है. यह मानते हुए कि अर्थव्यवस्था लगभग 7 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, उन्होंने सवाल उठाया कि इस विकास का फायदा किसे मिल रहा है.
उन्होंने कहा, “इसका फायदा किसे मिल रहा है? क्या कुछ गिने-चुने लोगों को? इस प्रक्रिया में, हमने नौकरियां पैदा नहीं की हैं. धन का वितरण असमान है.”
पित्रोदा ने सार्वजनिक सेवाओं की उपलब्धता को लेकर भी चिंता जताई, जिसमें मिड-डे मील (दोपहर का भोजन) और स्कूल की इमारतों की हालत जैसे मुद्दे शामिल हैं. उन्होंने तर्क दिया कि ये मुद्दे शासन (गवर्नेंस) और असमानता से जुड़ी व्यापक बहस का हिस्सा हैं.
–
केआर/


