
New Delhi, 22 सितंबर . ‘वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आए कुछ और निखर. सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है….’ यह रचना है राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की. हर वर्ष की 23 सितंबर को उनकी जयंती मनाई जाती है. यह वह दिन है जब हिंदी साहित्य के सूर्य राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म हुआ था.
उनकी कविताएं आज भी समाज, युवा और राष्ट्र की चेतना में धधक रही हैं. उनकी पंक्तियां केवल कविता नहीं थीं बल्कि वे एक आंदोलन थीं, एक ऐसा स्वर जिसने गुलामी के दौर में भी हिम्मत देने का काम किया और आजादी के बाद भी आत्मसम्मान और संस्कृति का पाठ पढ़ाया.
दिनकर सिर्फ एक कवि नहीं थे; वे शब्दों के महान योद्धा थे. उनकी लेखनी में देशभक्ति की गूंज, वीरता की ललकार और संवेदना की गहराई एक साथ मिलती है. दिनकर की रचनाओं में से एक, ‘हित-वचन नहीं तूने माना, मैत्री का मूल्य न पहचाना, तो ले, मैं भी अब जाता हूं, अंतिम संकल्प सुनाता हूं. याचना नहीं, अब रण होगा, जीवन-जय या कि मरण होगा,’ आज भी हर किसी के जुबान पर रहता है.
बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गांव में 23 सितंबर 1908 को एक साधारण कृषक परिवार में जन्मे दिनकर का जीवन संघर्षों से भरा रहा. बचपन में स्कूल जाने के लिए गंगा पार करना, पैदल लंबी दूरी तय करना और आर्थिक कठिनाइयां उनके जीवन का हिस्सा थे. महज दो वर्ष की उम्र में उनके पिता का निधन हो गया. विधवा मां ने कठिन परिस्थितियों में उनका पालन-पोषण किया. यही संघर्ष आगे चलकर उनकी कविताओं में ओज, विद्रोह और आक्रोश के रूप में प्रकट हुआ.
Patna विश्वविद्यालय से इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का भी गहन अध्ययन किया, जिसने उनके साहित्य को व्यापक दृष्टि दी. दिनकर की साहित्यिक यात्रा स्कूल के दिनों से ही शुरू हो गई थी. 1928 में प्रकाशित ‘बारदोली-विजय’ उनका पहला काव्य-संग्रह था. इसके बाद तो उनकी लेखनी ने कभी रुकना नहीं जाना. ‘रश्मिरथी,’ ‘कुरुक्षेत्र’ और ‘उर्वशी’ जैसे प्रबंध-काव्य हों या ‘हुंकार,’ ‘रेणुका,’ ‘रसवंती’ और ‘द्वंद्वगीत’ जैसे मुक्तक-काव्य, हर रचना में एक अलग ताप, एक अलग ऊर्जा दिखाई देती है.
उनकी कविताओं में जहां एक ओर वीर रस का उत्कर्ष है, वहीं दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की भी गहरी छाया दिखाई देती है. उन्होंने केवल कविता ही नहीं बल्कि निबंध, संस्मरण, आलोचना, डायरी और इतिहास जैसे गद्य साहित्य में भी लेखन किया, जिससे उनकी बहुआयामी प्रतिभा सामने आती है. उनका जीवन केवल साहित्य तक सीमित नहीं रहा.
आजीविका के लिए उन्होंने पहले अध्यापन किया, फिर बिहार Government में सब-रजिस्ट्रार बने और अंग्रेज Government के युद्ध-प्रचार विभाग में काम करते हुए भी उनके खिलाफ कविताएं लिखते रहे. आजादी के बाद वे मुजफ्फरपुर कॉलेज में हिंदी विभागाध्यक्ष बने और 1952 में राज्यसभा के सदस्य के रूप में संसद पहुंचे, जहां उन्होंने दो कार्यकाल तक अपनी सेवाएं दीं. बाद में भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति बने और फिर India Government के हिंदी सलाहकार के रूप में दिल्ली लौटे. दिनकर की लेखनी का प्रभाव इतना प्रखर था कि अंग्रेजी शासन भी उनसे असहज हो उठता था.
उनकी प्रतिभा को देश ने भी पूरे सम्मान के साथ स्वीकार किया. ‘संस्कृति के चार अध्याय’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, ‘उर्वशी’ के लिए ज्ञानपीठ सम्मान से नवाजा गया और India Government ने उन्हें ‘पद्म भूषण’ से अलंकृत किया. उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया जाना इस बात का प्रमाण है कि उनका योगदान केवल साहित्य तक सीमित नहीं बल्कि राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बन चुका है. उनका निधन 24 अप्रैल 1974 को हुआ था.
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एसडी/पीएम