
New Delhi, 7 अक्टूबर . भारतीय राजनीति में कुछ ऐसे भी नेता हुए, जिनकी पहचान सिर्फ उनके चुनावी प्रदर्शन या मंत्री पदों से नहीं बनी, बल्कि बदलते Political समीकरणों के बीच अपनी जगह बनाए रखने की क्षमता से बनी. पूर्व Union Minister स्वर्गीय रामविलास पासवान उन्हीं नेताओं में से एक थे.
बिहार की राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाने वाले रामविलास पासवान को राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने ‘राजनीति का मौसम वैज्ञानिक’ कहा था. वजह थी उनका Political कौशल, केंद्र में Government किसी भी दल या गठबंधन की हो, पासवान उसमें जगह बना ही लेते थे.
8 अक्टूबर 2020 को दुनिया को अलविदा कह चुके रामविलास पासवान की पुण्यतिथि पर उनका Political सफर एक बार फिर याद आता है. छह प्रधानमंत्रियों की Governmentों में Union Minister के तौर पर काम करने वाले पासवान का जीवन बिहार की राजनीति, दलित राजनीति और केंद्र की सत्ता के बदलते समीकरणों से जुड़ा रहा. पासवान का जन्म 5 जुलाई 1946 को बिहार के खगड़िया में एक दलित परिवार में हुआ था. उन्होंने खगड़िया के कोसी कॉलेज से कानून की पढ़ाई की. इसके बाद Patna यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया और कला में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की.
राजनीति में आने से पहले उन्होंने बिहार Police में डीएसपी के तौर पर भी काम किया. लेकिन जल्द ही उनका रास्ता राजनीति की ओर मुड़ गया. 1969 में वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य के तौर पर एक आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र से बिहार विधानसभा के लिए चुने गए. यहीं से उनका वह Political सफर शुरू हुआ, जिसने आने वाले दशकों में उन्हें बिहार से दिल्ली तक एक प्रमुख चेहरा बना दिया.
1974 में पासवान ने लोकदल के महासचिव की जिम्मेदारी संभाली. इसके अगले ही साल देश में इमरजेंसी लागू हुई. 21 महीने तक चले इस दौर में रामविलास पासवान को गिरफ्तार कर लिया गया और वे इमरजेंसी हटने तक जेल में रहे. 1977 में जेल से रिहाई के बाद उन्होंने जनता पार्टी के टिकट पर हाजीपुर से Lok Sabha चुनाव लड़ा. इस चुनाव में उन्होंने बड़ी जीत दर्ज की और सबसे ज्यादा वोटों के अंतर से चुनाव जीतने का रिकॉर्ड बनाया.
इसके बाद 1980 और 1984 में भी उन्होंने हाजीपुर से जीत हासिल की. देखते ही देखते हाजीपुर उनकी Political पहचान का मजबूत आधार बन गया. यह वही सीट थी, जहां से उन्होंने अपनी राष्ट्रीय राजनीति को मजबूत किया और लंबे समय तक अपनी पकड़ बनाए रखी.
पासवान ने वर्ष 1983 में ‘दलित सेना’ नाम से संगठन बनाया. इसका उद्देश्य दलित समुदाय के कल्याण के लिए काम करना था. बाद में इस संगठन का नाम बदलकर अनुसूचित जाति सेना कर दिया गया. जनता दल से अलग होने के बाद उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी यानी लोजपा की स्थापना की. बिहार की राजनीति में लोजपा के जरिए पासवान ने अपनी स्वतंत्र Political पहचान को आगे बढ़ाया. लेकिन, उनकी राजनीति का दायरा सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रहा. दिल्ली की सत्ता में उनकी मौजूदगी लगातार बनी रही.
रामविलास पासवान की Political यात्रा की सबसे खास बातों में से एक यह रही कि उन्होंने अलग-अलग Political दौर में देश के छह प्रधानमंत्रियों के साथ Union Minister के रूप में काम किया. विश्वनाथ प्रताप सिंह, एचडी देवगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और पीएम मोदी की Governmentों में उनका केंद्रीय राजनीति में प्रभाव दिखाई दिया. बदलती Governmentों के साथ उनकी भूमिका बदलती रही, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उनकी मौजूदगी बनी रही. यही वह Political क्षमता थी, जिस पर कटाक्ष करते हुए कभी उनके साथी और बाद में Political विरोधी बने लालू यादव ने उन्हें ‘मौसम वैज्ञानिक’ कहा था.
रामविलास पासवान की Political भूमिका को समझने के लिए 2005 का बिहार विधानसभा चुनाव एक अहम पड़ाव था. उस समय राबड़ी देवी बिहार की Chief Minister थीं. फरवरी-मार्च में हुए विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ राजद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन Government बनाने की स्थिति में नहीं पहुंच सकी. इस चुनाव में लोजपा की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई थी. बिहार में ऐसा समीकरण बना कि लोजपा जिस पक्ष को समर्थन देती, Government बनाने की स्थिति उसी की मजबूत होती.
पासवान ने लालू यादव के सामने एक Political शर्त रखी. उन्होंने कहा कि अगर लालू प्रसाद मुस्लिमों के सच्चे हितैषी हैं तो किसी मुस्लिम को राज्य की कमान सौंपें. ऐसी स्थिति में लोजपा Government को समर्थन देने के लिए तैयार थी. लेकिन, लालू यादव को यह मंजूर नहीं था. आखिरकार न लालू यादव सत्ता में लौट सके और न ही रामविलास पासवान की पार्टी Government बनाने में सफल हुई. स्थिति को देखते हुए पासवान ने Governor से President शासन लगाने की मांग की और राज्य में President शासन लगा.
राजनीति में पासवान को बदलते समीकरणों को समझने वाले नेता के तौर पर देखा जाता था. हालांकि, कहा जाता है कि अपने पूरे Political जीवन में वे एक बार Political हवा का रुख नहीं भांप सके. 2009 में उन्होंने कांग्रेस का साथ छोड़कर लालू प्रसाद यादव का हाथ थामा. इसके बाद वे अपनी पारंपरिक हाजीपुर सीट से चुनाव हार गए. यह वही हाजीपुर सीट थी, जहां से वे पहले रिकॉर्ड मतों के अंतर से जीत दर्ज कर चुके थे. हालांकि, अगले ही साल राज्यसभा के जरिए वे संसद पहुंचे. इसमें लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद और कांग्रेस का समर्थन उनके लिए महत्वपूर्ण रहा.
रामविलास पासवान का Political जीवन सिर्फ चुनाव जीतने और Governmentों में मंत्री बनने तक सीमित नहीं रहा. बिहार के एक दलित परिवार से निकलकर उन्होंने राज्य की राजनीति में जगह बनाई, फिर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पहचान कायम की और अलग-अलग दौर की केंद्र Governmentों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वे उन नेताओं में रहे, जिन्होंने सत्ता के कई बदलते केंद्रों के बीच अपनी Political भूमिका कायम रखी.
2021 में उन्हें मरणोपरांत देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया.
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पीएसके/एबीएम