
New Delhi, 20 सितंबर . टाटा संस की लिस्टिंग और एन.चंद्रशेखरन की चेयरमैन के रूप में दोबारा नियुक्ति पर टाटा ग्रुप में विवाद पर टाटा ट्रस्ट्स के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने Sunday को कहा कि कंपनी पर स्वामित्व रखने वाले शेयरहोल्डर के अधिकारों की मूल बात को इस तरह से खत्म नहीं किया जा सकता. मालिक, जो शेयरहोल्डर भी हैं, उनके अधिकारों को कमजोर या खत्म करने से India की सैकड़ों-हजारों कंपनियों में कॉर्पोरेट गवर्नेंस को लेकर गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है.
समाचार एजेंसी से बातचीत में सिंघवी ने कहा कि रतन टाटा के साथ मिलकर काम करने, टाटा ग्रुप की विरासत (चाहे वह ट्रस्ट हो या कंपनियां) को बहुत करीब से देखने, दोनों तरफ के मुख्य लोगों को न सिर्फ अच्छी तरह जानने बल्कि उनके साथ बेहतरीन संबंध रखने और दोनों पक्षों के लोगों के लिए मन में सच्चा और गहरा सम्मान होने के कारण, मेरी पहली प्रतिक्रिया निराशा की है.
लेकिन अब में एक पक्ष के वकील के रूप में शामिल हो रहा हूं, तो कहना चाहूंगा कि मालिक और शेयरधारकों के अधिकारों जैसी बुनियादी बात को इस तरह से खत्म नहीं किया जा सकता. शेयरधारक मालिकों के अधिकारों को कमजोर या खत्म करना, कॉर्पोरेट गवर्नेंस के लिहाज से सैकड़ों-हजारों भारतीय कंपनियों के लिए बर्बादी का कारण बन सकता है.
सिंघवी ने आगे कहा कि चैरिटी कमिश्नर के अचानक आए किसी रहस्यमयी आदेश से किसी ट्रस्ट के कामकाज को रोकना और फैसले लेने की प्रक्रिया में बाधा डालना—जिसका मतलब है कि ट्रस्ट आगे क्या करना है, इस पर चर्चा के लिए बैठक भी नहीं कर सकता—ट्रस्ट के भीतर लोकतांत्रिक कामकाज को पूरी तरह से नाकाम करने का एक और तरीका है.
टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच 100 साल से ज्यादा पुराने और गहरे रिश्ते को तोड़ना, और ऐसा व्यवहार करना मानो दोनों के बीच तलाक हो गया हो—कानूनी या किसी भी अन्य नजरिए से यह अकल्पनीय लगता है.
सिंघवी के मुताबिक, 100 साल से अधिक समय से बने टाटा संस के नियमों की अनदेखी करना, जो कि टाटा ट्रस्ट्स के साथ कंपनी के विशिष्ट संबंधों को दिखाते हैं, सही नहीं है. मिस्त्री मामले भी Supreme Court ने इन नियमों को माना था.
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एबीएस