बिहार : रेशमी धागों से संवारी तकदीर, भागलपुर की बीबी शबनम बनीं सफल ‘बुनकर दीदी’

भागलपुर, 3 सितंबर . बिहार के भागलपुर जिले के जगदीशपुर प्रखंड के मोहिबअली चक गांव की बीबी शबनम ने पारंपरिक हुनर को कारोबार में बदलकर आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश की है. कभी महाजनों से धागा लेकर सिल्क साड़ी बुनने वाली शबनम आज ‘बुनकर दीदी’ के नाम से पहचान बना चुकी हैं और अपने कारोबार से सालाना 10 लाख रुपये से अधिक की आय अर्जित कर रही हैं.

समा जीविका स्वयं सहायता समूह की सदस्य बीबी शबनम का परिवार लंबे समय से हथकरघा सिल्क वस्त्रों की बुनाई से जुड़ा रहा है. पहले गांव के करीब 15 बुनकर परिवार महाजनों पर निर्भर थे. महाजन धागा उपलब्ध कराते थे और बुनाई के बदले बुनकरों को महज 50 से 60 रुपये प्रति मीटर मजदूरी मिलती थी. काम भी नियमित नहीं था और परिवार की मासिक आय बमुश्किल छह से सात हजार रुपये तक पहुंचती थी. जीविका से जुड़ने के बाद शबनम के जीवन में बड़ा बदलाव आया.

उन्होंने गांव के 15 बुनकर परिवारों को एकजुट कर प्राची जीविका महिला रेशम वस्त्र उत्पादक समूह का गठन किया. नई उड़ान जीविका महिला संकुल स्तरीय संघ के माध्यम से उत्पादक समूह को कारोबार बढ़ाने के लिए 4 लाख 95 हजार रुपये की वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई गई. इससे बुनकरों को अपनी जरूरत के अनुसार बाजार से धागा खरीदने और तैयार उत्पाद को खुद बेचने का अवसर मिला. अब शबनम खुद बाजार से धागा खरीदती हैं, हथकरघे पर सिल्क साड़ियां तैयार करती हैं और उन्हें स्थानीय दुकानदारों, थोक कारोबारियों तथा विभिन्न मेलों में बेचती हैं.

उन्होंने बताया कि एक सिल्क साड़ी तैयार करने में करीब 500 ग्राम धागा लगता है, जिसकी कीमत लगभग 3,200 रुपये होती है. बुनाई पर करीब 650 रुपये और फिनिशिंग पर कम से कम 100 रुपये खर्च होते हैं. इस तरह एक साड़ी की लागत करीब चार हजार रुपये आती है और उसे 4,500 से 5,000 रुपये तक में बेचने पर प्रति साड़ी 500 से 1,000 रुपये तक का लाभ होता है. शबनम की खासियत सिर्फ खुद साड़ी तैयार करना नहीं, बल्कि गांव की अन्य बुनकर महिलाओं को भी बाजार से जोड़ना है. वह अपने गांव के सभी 15 बुनकर परिवारों द्वारा तैयार साड़ियां खरीदकर विभिन्न शहरों में लगने वाले मेलों और आयोजनों में स्टॉल के माध्यम से बेचती हैं. जीविका की मदद से उन्हें राज्य के साथ-साथ देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित सरस मेलों और अन्य आयोजनों में भाग लेने का अवसर मिला.

बताया गया कि रांची के खादी महोत्सव, Patna के बिहार सरस मेले, फरीदाबाद के सूरजकुंड मेले, New Delhi के आईआईटीएफ, Patna के महिला उद्यमी मेले, कोलकाता सरस मेले और सिलीगुड़ी सरस मेले समेत विभिन्न आयोजनों में शबनम ने कुल 32.60 लाख रुपये की बिक्री की और करीब 4.81 लाख रुपये का लाभ अर्जित किया. मेलों में कई बार वह एक आयोजन के दौरान 100 तक साड़ियों की बिक्री कर लेती हैं. खुले बाजार में भी उनका कारोबार लगातार बढ़ रहा है. भागलपुर के थोक कारोबारियों के अलावा देश के अन्य बाजारों में भी उनकी साड़ियों की मांग है.

वहीं, शिल्पग्राम महिला प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड, दरभंगा की ओर से उन्हें 50 साड़ियों का ऑर्डर भी मिला है. सिल्क साड़ियों के साथ शबनम दुपट्टे और अन्य रेशमी वस्त्र भी तैयार करती हैं. उनका कारोबार अब सिर्फ परिवार की आय का जरिया नहीं, बल्कि गांव की अन्य बुनकर महिलाओं के लिए भी रोजगार का माध्यम बन गया है. महाजनों पर निर्भरता खत्म कर स्वयं धागा खरीदने, उत्पादन करने और बाजार तक पहुंच बनाने वाली शबनम की कहानी बताती है कि परंपरागत हुनर को संगठन, पूंजी और सही बाजार मिले तो ग्रामीण महिलाएं सफल उद्यमी बन सकती हैं.

एमएनपी/एसके

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