पीपी चौधरी ने ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के बताए फायदे, बोले- ‘बार-बार चुनाव से सरकारी स्कूलों की पढ़ाई पर असर’

जोधपुर, 27 अगस्त . ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के तहत चुनाव एक साथ कराने को लेकर गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के चेयरमैन और BJP MP पीपी चौधरी ने चुनावी व्यवस्था, Government गिरने की स्थिति और राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल को लेकर महत्वपूर्ण बातें कहीं. उन्होंने कहा कि यदि अविश्वास प्रस्ताव के कारण कोई Government गिर जाती है और दूसरी Government नहीं बन पाती, तो मध्यावधि चुनाव कराए जा सकते हैं. हालांकि, ऐसे चुनाव Government के पूरे पांच साल के लिए नहीं, बल्कि बचे हुए कार्यकाल के लिए होंगे.

BJP MP पीपी चौधरी ने समाचार एजेंसी से बात करते हुए कहा कि संसद या विधानसभा में दोनों प्रस्तावों पर एक साथ चर्चा हो सकती है. यदि अविश्वास प्रस्ताव सफल होता है और दूसरी Government बन जाती है, तो चुनाव कराने की आवश्यकता नहीं पड़ती.

चौधरी के अनुसार, इस तरह की व्यवस्था का उद्देश्य Government गिरने के बाद पैदा होने वाले Political संकट को चुनाव के बजाय सदन के भीतर ही हल करना है.

पीपी चौधरी ने संविधान के अनुच्छेद 174(2) का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई Chief Minister बहुमत में होने के बावजूद विधानसभा को समय से पहले भंग कराने की इच्छा रखता है, तो यह संवैधानिक प्रक्रिया के तहत संभव है. उन्होंने कहा कि यह निर्णय जेपीसी या संसद के अधिकार क्षेत्र का विषय नहीं है.

उन्होंने कहा कि यदि किसी राज्य का Chief Minister चाहता है कि उसकी विधानसभा को भंग कर Lok Sabha के साथ चुनाव कराया जाए, तो वह Governor से इसकी सिफारिश कर सकता है. संविधान के प्रावधानों के तहत Governor विधानसभा भंग कर सकते हैं और इसके बाद उस राज्य में Lok Sabha के साथ चुनाव कराया जा सकता है.

चौधरी ने कहा कि यदि कई राज्यों के Chief Minister ऐसा चाहते हैं कि उनकी विधानसभाओं के चुनाव Lok Sabha के साथ कराए जाएं, तो संवैधानिक प्रावधानों के तहत इसकी प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है. उन्होंने स्पष्ट किया कि जेपीसी इस मामले में किसी राज्य Government की संवैधानिक शक्तियों को सीमित नहीं कर रही है.

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के संवैधानिक और संघीय ढांचे पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर उठ रहे सवालों पर भी पीपी चौधरी ने समिति की ओर से किए गए विचार-विमर्श का उल्लेख किया.

उन्होंने बताया कि समिति में छह जाने-माने कानून विशेषज्ञ शामिल हैं. इसके अलावा समिति के सामने Supreme Court के छह पूर्व न्यायाधीश और दिल्ली हाई कोर्ट के तीन पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने अपनी राय रखी है.

चौधरी के मुताबिक, इन विशेषज्ञों और पूर्व न्यायाधीशों का मानना है कि एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था से संविधान के मूल ढांचे या संघीय ढांचे का उल्लंघन नहीं होता. उन्होंने कहा कि विशेषज्ञों ने इसे देश के हित में बताया है और माना है कि एक साथ चुनाव होने से चुनाव प्रक्रिया अधिक स्वतंत्र और निष्पक्ष हो सकती है.

उन्होंने चुनाव के दौरान मुफ्त उपहार यानी ‘फ्रीबीज’ बांटने के मुद्दे का भी जिक्र किया. चौधरी का कहना है कि यदि अलग-अलग समय पर होने वाले कई चुनावों की जगह एक साथ चुनाव होते हैं तो Political दलों द्वारा बार-बार चुनावी घोषणाएं और मुफ्त योजनाओं की घोषणा करने की गुंजाइश कम हो सकती है. समिति ने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग से भी चर्चा की है.

पीपी चौधरी ने बार-बार होने वाले चुनावों के कारण Governmentी स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित होने का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने कहा कि Lok Sabha, विधानसभा, नगर पालिका और पंचायत चुनावों के दौरान स्कूलों और कॉलेजों की इमारतों का इस्तेमाल मतदान केंद्रों के रूप में किया जाता है. इसके अलावा बड़ी संख्या में शिक्षकों को चुनाव ड्यूटी में लगाया जाता है.

उन्होंने कहा कि इसका सीधा असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ता है. चौधरी ने Gujarat का उदाहरण देते हुए दावा किया कि वहां करीब तीन लाख शिक्षकों में से लगभग 85 प्रतिशत शिक्षक चुनाव ड्यूटी में लगाए गए थे. ऐसे में शिक्षकों की गैर-मौजूदगी से Governmentी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की शिक्षा प्रभावित होना स्वाभाविक है.

उन्होंने कहा कि लंबे समय तक चुनावी गतिविधियों में शिक्षकों और शिक्षाविदों के व्यस्त रहने से Governmentी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है. उनके अनुसार, यही एक कारण है कि अभिभावक Governmentी स्कूलों के बजाय निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं और Governmentी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या घट रही है.

एसएके/डीकेपी

Leave a Comment