पाकिस्तान जिस तालिबान को रणनीतिक ताकत मानता था, वही अब बना सुरक्षा चुनौती: रिपोर्ट

इस्लामाबाद, 21 अक्टूबर . Pakistan ने कभी अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी को क्षेत्र में अपनी रणनीतिक ताकत बढ़ाने के अवसर के रूप में देखा था, लेकिन अब यही उसके लिए लगातार सुरक्षा चुनौती बन गया है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान Government अपनी Political सत्ता और सुरक्षा प्राथमिकताओं को Pakistan के अधीन करने के लिए तैयार नहीं है. इसके चलते दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता गया और मामला सीधे सैन्य टकराव तक पहुंच गया.
कोलंबिया पॉलिटिकल रिव्यू में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, Pakistan और अफगानिस्तान के बीच एक साल से अधिक समय से संघर्ष जारी है. जून में Pakistan ने अफगानिस्तान में हवाई हमले किए थे. तालिबान ने इन हमलों में 13 नागरिकों की मौत और 14 लोगों के घायल होने का दावा किया था, जबकि Pakistan ने कहा था कि उसने 26 आतंकवादियों को मार गिराया. दोनों देशों के बीच ऐसे विरोधाभासी दावे अब आम हो गए हैं. Pakistan इन हमलों को आतंकवाद विरोधी कार्रवाई बताता है, जबकि अफगानिस्तान इन्हें नागरिकों पर हमला करार देता है.
रिपोर्ट में अनाया कय्यूम ने लिखा कि अफगानिस्तान पर अमेरिकी कब्जे के दौरान Pakistan ने तालिबान को सुरक्षित ठिकाने और खुफिया सहायता उपलब्ध कराई थी. ऐसे में माना जा रहा था कि अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद दोनों देशों के संबंध और मजबूत होंगे. हालांकि, यह आकलन गलत साबित हुआ और दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव शुरू हो गया.
Pakistan और अफगानिस्तान के संबंधों में तनाव बढ़ने की एक प्रमुख वजह तहरीक-ए-तालिबान Pakistan (टीटीपी) के हमले हैं. Pakistan का आरोप है कि टीटीपी के आतंकवादी अफगानिस्तान में सुरक्षित ठिकानों से काम कर रहे हैं और Pakistan में हमलों को अंजाम दे रहे हैं. इसके जवाब में Pakistan ने अफगानिस्तान की सीमा के भीतर हवाई हमले किए और बिना दस्तावेजों के रह रहे अफगान शरणार्थियों को देश से बाहर निकालना शुरू कर दिया. इससे दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया.
रिपोर्ट में कहा गया है कि Pakistan चाहता है कि अफगान तालिबान टीटीपी के खिलाफ कार्रवाई करे. हालांकि, दोनों संगठनों के बीच वैचारिक समानता और उनके सदस्यों के आपसी संबंध इस मामले को जटिल बनाते हैं. इसके अलावा, पश्तून पहचान भी अहम भूमिका निभाती है. सीमा के दोनों ओर रहने वाले पश्तूनों के बीच जातीय संबंध आधिकारिक सीमा से परे हैं. ऐसे में तालिबान के लिए टीटीपी के खिलाफ कार्रवाई करना अपने ही समुदाय के लोगों के साथ विश्वासघात जैसा माना जा सकता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानिस्तान में सत्ता की वैधता ऐतिहासिक रूप से विदेशी शक्तियों के नियंत्रण का विरोध करने से जुड़ी रही है. तालिबान खुद को स्वतंत्र इस्लामी राष्ट्रवादी संगठन के रूप में पेश करता है, जिसने अफगानिस्तान को विदेशी आक्रमणकारियों से मुक्त कराया. ऐसे में Pakistan का प्रभाव स्वीकार करना उसके Political दावों के विपरीत हो सकता है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि Pakistan अब उस शासन के साथ सक्रिय संघर्ष में उलझ गया है, जिसे कभी वह अपना रणनीतिक सहयोगी मानता था. इस संघर्ष का खामियाजा अफगान नागरिकों को भी भुगतना पड़ रहा है. Pakistan के हवाई हमलों के अलावा तालिबान शासन की नीतियों ने भी लोगों के सामने मुश्किलें खड़ी की हैं. तालिबान ने लड़कियों के माध्यमिक और उच्च शिक्षा हासिल करने पर रोक लगा रखी है.
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डीएससी


