
इस्लामाबाद, 9 अक्टूबर . Pakistan के पंजाब प्रांत में इस समय 500 से अधिक लड़कियों के लापता होने के मामले लंबित हैं. यह जानकारी पंजाब के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ Police (आईजीपी) राव अब्दुल करीम ने दी. स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने यह जानकारी लाहौर हाईकोर्ट में पेशी के दौरान दी.
आईजीपी अदालत में उस समय पेश हुए, जब मुख्य न्यायाधीश आलिया नीलम पंजाब के फैसलाबाद की निवासी सादिया हुसैन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थीं. याचिका में सादिया ने अपनी लापता बेटी को बरामद करने की मांग की थी. यह जानकारी Pakistan के प्रमुख अखबार डॉन ने दी.
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने पंजाब में लापता लड़कियों से जुड़े मामलों की संख्या के बारे में पूछा. इस पर आईजीपी ने बताया कि प्रांत में ऐसे 500 से अधिक मामले लंबित हैं. न्यायाधीश ने यह भी पूछा कि क्या Police बच्चों और महिलाओं से जुड़े मामलों के लिए कोई विशेष व्यवस्था अपनाती है. जवाब में राव अब्दुल करीम ने कहा कि ऐसे मामलों से निपटने के लिए विशेष समितियां बनाई गई हैं.
मुख्य न्यायाधीश आलिया नीलम ने टिप्पणी की कि Police तब ही सक्रिय दिखाई देती है जब अदालत किसी मामले का संज्ञान लेती है. उन्होंने एक ऐसे मामले का उल्लेख किया, जिसमें एक लड़की दो वर्षों तक लापता रही और अदालत के हस्तक्षेप के बाद ही उसे खोजा जा सका. न्यायाधीश ने महिलाओं से जुड़े मामलों में Police की लापरवाही पर नाराजगी जताते हुए आईजीपी को लापता लड़कियों की तलाश के लिए किए जा रहे प्रयासों की विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया.
इस बीच, अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन वॉयस ऑफ Pakistan माइनॉरिटी ने कहा कि पंजाब की राजधानी लाहौर में वर्ष 2026 के पहले आठ महीनों में 498 दुष्कर्म और 36 सामूहिक दुष्कर्म के मामले दर्ज किए गए हैं.
इन आंकड़ों पर गहरी चिंता जताते हुए संगठन ने कहा कि इसका मतलब है कि शहर में प्रतिदिन औसतन चार से अधिक यौन अपराध दर्ज किए गए.
संगठन ने कहा, ”कोई भी इलाका इससे अछूता नहीं है और कोई भी समुदाय पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. यदि अप्राकृतिक यौन शोषण (सोडोमी) के मामलों को भी शामिल किया जाए, तो आठ महीनों में कुल 1,108 यौन अपराधों के मामले दर्ज हुए हैं. ये अपराध केवल सुनसान या पिछड़े इलाकों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अमीर बस्तियों, भीड़भाड़ वाले बाजारों और शांत रिहायशी क्षेत्रों में भी हो रहे हैं. हिंसा हर जगह है और उसके साथ डर भी मौजूद है.”
वीओपीएम ने यह भी कहा कि ये आंकड़े पूरी तस्वीर नहीं दिखाते. मानवाधिकार संगठनों का लंबे समय से कहना है कि दर्ज First Information Report वास्तविक अपराधों की तुलना में बहुत कम होती हैं.
संगठन के मुताबिक, ”सामाजिक बदनामी, शर्म, पारिवारिक दबाव, Police पर भरोसे की कमी और समाज से बहिष्कृत किए जाने के डर के कारण कई पीड़ित सामने नहीं आते. बहुत से लोग शिकायत दर्ज नहीं कराते, कई को चुप रहने के लिए कहा जाता है और कई मामलों में पीड़ितों को ही दोषी ठहराया जाता है. दर्ज मामलों की संख्या बढ़ना दो बातों का संकेत हो सकता है, एक ओर अपराध बढ़ रहे हैं और दूसरी ओर पीड़ितों में शिकायत दर्ज कराने का साहस भी बढ़ रहा है, लेकिन अधिक रिपोर्टिंग के बावजूद व्यवस्था अक्सर न्याय मांगने वालों को निराश करती है.”
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एएमटी/डीकेपी