दुर्गादास उइके ने 3 दिन के सम्मेलन में भाषा संरक्षण पर जनजातीय मंत्रालय की चर्चाओं का नेतृत्व किया

New Delhi, 24 अगस्त . जनजातीय मामलों के राज्य मंत्री दुर्गादास उइके ने Monday को मैसूर में शुरू हुए तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में जनजातीय भाषाओं के दस्तावेजीकरण और जनजातीय संग्रहालयों व जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों (टीएफएफएम) को मजबूत करने पर हुई राष्ट्रीय चर्चा की अध्यक्षता की. जनजातीय मामलों के मंत्रालय के एक अधिकारी ने यह जानकारी दी.

अधिकारी ने एक बयान में कहा कि इस नेशनल कॉन्क्लेव का मकसद Prime Minister Narendra Modi के ‘विकसित India 2047’ के रोडमैप को आगे बढ़ाना है. इसके तहत India की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को फिर से जीवित करना और यह सुनिश्चित करना कि कोई भी समुदाय पीछे न छूटे, समावेशी राष्ट्रीय विकास के मुख्य स्तंभ हैं.

यह कॉन्क्लेव नीति-निर्माताओं, भाषाविदों, शोधकर्ताओं, प्रौद्योगिकीविदों और आदिवासी समुदाय के प्रतिनिधियों को एक साथ लाता है ताकि वे आदिवासी भाषाओं के दस्तावेज़ीकरण और उन्हें फिर से जीवित करने और देश भर में आदिवासी और आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों (टीएफएफएम) को मजबूत करने पर चर्चा कर सकें.

मंत्रालय 24-26 अगस्त तक आदिवासी भाषाओं और संग्रहालयों पर नेशनल कॉन्क्लेव आयोजित कर रहा है. इसका मकसद आदिवासी भाषाओं के दस्तावेज़ीकरण, संरक्षण और उन्हें फिर से जीवित करने पर बातचीत के लिए एक मंच प्रदान करना है, साथ ही देश भर में आदिवासी संग्रहालयों और आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों (टीएफएफएम) को मजबूत करने पर भी समानांतर चर्चा करना है.

यह कॉन्क्लेव Prime Minister द्वारा 2016 के स्वतंत्रता दिवस भाषण में साझा किए गए उस विज़न को आगे बढ़ाएगा, जिसमें India की स्वतंत्रता की लड़ाई में आदिवासी समुदायों के योगदान को मान्यता दी गई थी.

इसके तहत, मंत्रालय ने 10 राज्यों में 11 आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों को मंजूरी दी है, जिनमें से चार का उद्घाटन हो चुका है. कॉन्क्लेव में आदिवासी संग्रहालयों और टीएफएफएम के लिए एक साझा विजन पर चर्चा की जाएगी, ताकि उन्हें समकालीन क्यूरेशन, कहानी कहने और समुदाय-आधारित विरासत के प्रतिनिधित्व के जीवंत संस्थानों के रूप में विकसित किया जा सके.

बयान में कहा गया है कि यह Prime Minister के उस व्यापक विश्वास को दर्शाता है कि भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं है, बल्कि किसी समुदाय की संस्कृति, विरासत और पारंपरिक ज्ञान का जीवंत भंडार है, एक ऐसा विजन जिसमें आदिवासी भाषाओं का केंद्रीय स्थान है.

नेशनल कॉन्क्लेव का मकसद समुदाय की प्राथमिकताओं को एजेंडे के केंद्र में रखना और आदिवासी भाषाओं के दस्तावेजीकरण, संरक्षण और उन्हें फिर से जीवित करने के लिए एक राष्ट्रीय रोडमैप तैयार करना भी है.

बयान में कहा गया है कि मंत्रालय यह भी मानता है कि किसी आदिवासी भाषा के खोने के साथ ही पारिस्थितिक, औषधीय, कृषि और सांस्कृतिक ज्ञान का पूरा भंडार भी खो जाता है. इसलिए, मंत्रालय ने आदिवासी भाषाओं के संरक्षण के लिए आदिवासी अनुसंधान संस्थानों (टीआरआई) और राज्य आदिवासी कल्याण विभागों के नेटवर्क को शामिल किया है.

एससीएच

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