दीपावली पर महालक्ष्मी के दर्शन के लिए खास है कर्नाटक का गोरवनहल्ली मंदिर, जानें इसकी मान्यता और इतिहास

New Delhi, 4 नवंबर . दीपावली का त्योहार आते ही घरों से लेकर मंदिरों तक मां लक्ष्मी की पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं. इस दिन लोग सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना के साथ मां लक्ष्मी का आशीर्वाद लेते हैं. देश में मां महालक्ष्मी के कई प्रसिद्ध मंदिर हैं, जहां सालभर भक्तों की भीड़ रहती है. ऐसा ही एक मंदिर कर्नाटक के तुमकुरु जिले के गोरवनहल्ली गांव में स्थित श्री महालक्ष्मी मंदिर है. मान्यता है कि यहां मां महालक्ष्मी स्वयंभू रूप में विराजमान हैं. यही वजह है कि कर्नाटक के अलावा दूसरे राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं.
गोरवनहल्ली महालक्ष्मी मंदिर कर्नाटक के तुमकुरु जिले की कोराटागेरे तहसील में स्थित है. तुमकुरु शहर से इसकी दूरी करीब 30 किलोमीटर है. यहां विराजमान मां महालक्ष्मी को धन, वैभव और समृद्धि की देवी के रूप में पूजा जाता है. मंदिर का भव्य प्रवेश द्वार और रंग-बिरंगा गोपुरम श्रद्धालुओं का ध्यान खींचता है. इस मंदिर में मुख्य देवी के अलावा अन्य देवी-देवताओं के छोटे मंदिर भी हैं.
मंदिर को लेकर स्थानीय मान्यता के अनुसार, 20वीं सदी की शुरुआत में अभय्या नाम के एक ग्रामीण को मां महालक्ष्मी की मूर्ति मिली थी. वह इस मूर्ति को अपने घर में रखकर पूजा करने लगे. मान्यता है कि मां की कृपा से उनके जीवन में सुख-समृद्धि आई और उन्होंने अपनी संपत्ति का इस्तेमाल जरूरतमंदों की मदद के लिए करना शुरू किया. उनके घर को इसी वजह से ‘लक्ष्मी निवास’ कहा जाने लगा.
कुछ समय बाद अभय्या के भाई थोटादप्पा भी मां की पूजा और सेवा में उनके साथ जुड़ गए. मान्यता के अनुसार, एक दिन मां महालक्ष्मी ने थोटादप्पा को सपने में दर्शन देकर उनके लिए मंदिर बनवाने का निर्देश दिया. इसके बाद उन्होंने देवी के लिए एक छोटा मंदिर बनवाया और नियमित पूजा शुरू की.
मंदिर के इतिहास में कमलम्मा का नाम खास तौर पर लिया जाता है. वह 1925 में गोरवनहल्ली पहुंचीं और मंदिर में पूजा-पाठ को जारी रखा. धीरे-धीरे मां महालक्ष्मी के दर्शन के लिए भक्तों की संख्या बढ़ने लगी और मंदिर की पहचान आसपास के इलाकों से निकलकर दूर-दूर तक पहुंच गई.
मंदिर में सालभर पूजा-अर्चना होती है, लेकिन कुछ खास मौके पर यहां धार्मिक उत्साह का रंग अलग ही देखने को मिलता है. मंदिर ट्रस्ट की वेबसाइट के अनुसार, श्रावण मास के दूसरे Friday को वरमहालक्ष्मी व्रत के अवसर पर देवी का विशेष फूलों से श्रृंगार किया जाता है और हवन सहित विशेष पूजा होती है. नवरात्रि के नौ दिनों में भी मां का अलग-अलग रूपों में श्रृंगार और विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं.
कार्तिक मास के अंतिम Friday को मंदिर में विशेष पूजा, हवन, पंचामृत अभिषेक और दीपोत्सव का आयोजन किया जाता है. इस दौरान ब्रह्मरथोत्सव और मुथिना पल्लक्की उत्सव जैसे धार्मिक कार्यक्रम भी होते हैं. मंदिर में लक्षदीपोत्सव और चांदी के रथ से जुड़ा आयोजन भी प्रमुख आकर्षणों में शामिल है. मंदिर का यह उत्सव भक्तों के लिए खास महत्व रखता है.
मंदिर ट्रस्ट की ओर से श्रद्धालुओं के लिए कई सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं. ट्रस्ट की वेबसाइट के मुताबिक, यहां आने वाले भक्तों के लिए मुफ्त भोजन की व्यवस्था है. मंदिर परिसर में स्नानागार, शौचालय और ठहरने के लिए यात्री निवास भी बनाए गए हैं. इसके अलावा, ट्रस्ट शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े सामाजिक कार्य भी करता है. इनमें जरूरतमंद विद्यार्थियों को किताबें देना, स्वास्थ्य जांच शिविर लगाना और सामूहिक विवाह आयोजित करना शामिल है.
मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट पर दर्शन का समय सुबह साढ़े छह बजे से रात साढ़े आठ बजे तक बताया गया है. विशेष त्योहारों और धार्मिक आयोजनों के दौरान समय में बदलाव हो सकता है.
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पीके/एबीएम


