तकनीक समस्या नहीं, बिना उद्देश्य इस्तेमाल है खतरनाक! जानिए डिजिटल बैलेंस का मंत्र

New Delhi, 31 अगस्त . आज के दौर में स्मार्टफोन और social media हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं. पढ़ाई हो, काम हो, खबरें जाननी हों या दोस्तों और परिवार से जुड़ना हो, डिजिटल प्लेटफॉर्म ने कई चीजें आसान कर दी हैं. लेकिन क्या आपने कभी महसूस किया है कि आप फोन चलाने का फैसला खुद कर रहे हैं या फिर कोई एल्गोरिदम आपको बार-बार स्क्रीन पर वापस ला रहा है?

social media और डिजिटल प्लेटफॉर्म हमें हमारी पसंद के मुताबिक कंटेंट दिखाते हैं. इससे हमें अपने जैसे लोगों से जुड़ने, नई चीजें सीखने और अपनी रुचियों को समझने में मदद मिलती है. लेकिन यही सुविधा कभी-कभी हमारी आदत भी बन जाती है. हम बिना किसी खास वजह के फोन खोलते हैं, एक वीडियो देखते हैं और फिर दूसरा अपने आप चल जाता है. देखते ही देखते कुछ मिनट कब आधे या एक घंटे में बदल जाते हैं, पता ही नहीं चलता.

कई डिजिटल प्लेटफॉर्म इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि यूजर ज्यादा से ज्यादा समय तक उनसे जुड़ा रहे. इंफिनिटी स्क्रॉल इसका एक बड़ा उदाहरण है. इसमें कंटेंट खत्म ही नहीं होता और हम लगातार नीचे स्क्रॉल करते रहते हैं. इसी तरह ऑटोप्ले अगला वीडियो खुद शुरू कर देता है, जबकि कई बार हमारा उसे देखने का कोई इरादा भी नहीं होता.

बार-बार आने वाले पुश नोटिफिकेशन भी हमारा ध्यान भटकाते हैं. मैसेज, लाइक, कमेंट या किसी नए पोस्ट की सूचना मिलते ही हमारा हाथ फोन की तरफ चला जाता है. धीरे-धीरे यह एक ऐसी आदत बन सकती है जिसमें हम जरूरत के बजाय नोटिफिकेशन के हिसाब से फोन इस्तेमाल करने लगते हैं.

social media पर लाइक्स और फॉलोअर्स की संख्या, स्ट्रीक्स, रिमाइंडर्स और पर्सनलाइज्ड फीड भी हमें प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने में भूमिका निभाते हैं. इसलिए जरूरी है कि हम इन डिजिटल हुक्स को पहचानें और खुद से पूछें—क्या मैं सच में यह देखना चाहता हूं या सिर्फ इसलिए देख रहा हूं क्योंकि स्क्रीन पर अगला कंटेंट आ गया है?

डिजिटल संतुलन का मतलब यह नहीं है कि स्मार्टफोन या social media को पूरी तरह छोड़ दिया जाए. असली बात है कि तकनीक हमारे नियंत्रण में रहे. फोन उठाने से पहले खुद से पूछें कि इसका उद्देश्य क्या है. पढ़ाई, काम, जानकारी या बातचीत के लिए फोन इस्तेमाल कर रहे हैं तो ठीक है, लेकिन बिना मकसद लगातार स्क्रॉल करने से बचना चाहिए.

जरूरी नहीं होने वाले नोटिफिकेशन बंद किए जा सकते हैं. social media के लिए समय तय किया जा सकता है. सोने से पहले फोन को दूर रखना और रात में गैर-जरूरी अलर्ट बंद करना भी अच्छी आदत है.

लगातार स्क्रीन पर बने रहने का असर हमारी नींद और रोजमर्रा की दिनचर्या पर पड़ सकता है. इसलिए पर्याप्त नींद, शारीरिक गतिविधि और नियमित ब्रेक को प्राथमिकता देना जरूरी है. लंबे समय तक स्क्रीन देखने के बीच उठकर थोड़ा चलना-फिरना, परिवार के साथ समय बिताना, दोस्तों से आमने-सामने मिलना, किताब पढ़ना या प्रकृति के बीच वक्त बिताना डिजिटल संतुलन बनाने में मदद कर सकता है.

आखिरकार तकनीक खुद समस्या नहीं है, उसका जरूरत से ज्यादा और बिना उद्देश्य इस्तेमाल समस्या बन सकता है. हमें यह तय करना है कि हम तकनीक का इस्तेमाल कब और क्यों करेंगे. एल्गोरिदम को अपना समय तय करने देने के बजाय अपनी जरूरत और उद्देश्य के हिसाब से डिजिटल दुनिया का इस्तेमाल करें.

पीआईएम/एएस

Leave a Comment