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Saturday, 17 October 2026
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टीवीके के प्रचार में बच्चों को शामिल करना गलत चलन: मद्रास हाई कोर्ट

टीवीके के प्रचार में बच्चों को शामिल करना गलत चलन: मद्रास हाई कोर्ट

चेन्नई, 16 अक्टूबर . मद्रास हाई कोर्ट ने चुनाव प्रचार और social media रील्स में बच्चों को शामिल करके टीवीके प्रमुख जोसेफ विजय के लिए वोट मांगने की आलोचना की है. कोर्ट ने इसे Political मकसद से प्रेरित और एक गलत चलन बताया, साथ ही कहा कि यह खराब परवरिश को दर्शाता है.

तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) के विधायक के शिवकुमार के खिलाफ दायर एक चुनावी याचिका को खारिज करते हुए जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती ने कहा कि न तो Political दल और न ही उनके उम्मीदवार किसी भी चुनावी गतिविधि में बच्चों को शामिल कर सकते हैं.

हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान टीवीके द्वारा प्रचार के लिए बच्चों का इस्तेमाल किए जाने के आरोपों पर कोर्ट ने कई टिप्पणियां कीं.

जस्टिस भरत चक्रवर्ती ने कहा कि इस तरह के प्रचार में बच्चों को शामिल करना पूरी तरह से गलत और अनुचित है.

कोर्ट ने कहा कि बच्चों को इसमें शामिल होने देना खराब परवरिश को दिखाता है. कोर्ट ने कहा कि बच्चों का इस्तेमाल करके प्रचार की रील्स बनाना न केवल गरिमा के खिलाफ है, बल्कि Political मकसद से प्रेरित भी है.

कोर्ट ने कहा कि क्या ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाई जानी चाहिए या इन्हें चुनाव रद्द करने का आधार बनाया जाना चाहिए. यह एक बड़ा मुद्दा है जिस पर संसद को विचार करने की जरूरत है.

कोर्ट ने यह टिप्पणी तब की जब उसने टीवीके विधायक के शिवकुमार की एक अर्जी को स्वीकार कर लिया. शिवकुमार ने सलेम नॉर्थ विधानसभा क्षेत्र से अपनी जीत को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका को खारिज करने की मांग की थी.

चुनाव याचिका के अनुसार, टीवीके प्रमुख जोसेफ विजय ने सीधे बच्चों से अपील की थी कि वे अपने माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को टीवीके और उसके चुनाव चिह्न ‘सीटी’ को वोट देने के लिए प्रेरित करें.

याचिका में आरोप लगाया गया है कि इसके बाद social media पर कई ऐसी रील्स सामने आईं, जिनमें बच्चों को अपने माता-पिता और दादा-दादी पर टीवीके को वोट देने के लिए दबाव डालते हुए देखा जा सकता था.

अदालत ने कहा कि इस मामले में मुख्य प्रश्न यह है कि क्या किसी Political नेता द्वारा बच्चों के बीच प्रचार करना और उनसे अपने माता-पिता को अपने पक्ष में वोट देने के लिए राजी करने को कहना अनुचित प्रभाव डालने के बराबर है.

इस संबंध में, अदालत ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत ‘अनुचित प्रभाव’ की परिभाषा का हवाला दिया और शिव कृपाल सिंह मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस मुद्दे पर किए गए विस्तृत विचार का उल्लेख किया.

अदालत ने कहा कि उन परिस्थितियों पर विचार करना महत्वपूर्ण है, जिनमें बच्चे वीडियो में दिखाई दिए. बच्चों के पास अपने मोबाइल फोन नहीं थे और वे स्वतंत्र रूप से रील नहीं बना सकते थे. घर के वयस्कों ने उन्हें Political नेता की अपील दिखाई, उन्हें ऐसी गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया, रील बनाई और उनका प्रचार किया.

इसलिए, अदालत ने कहा कि इस आचरण को ऐसी स्थिति नहीं माना जा सकता जिसमें बच्चों ने अकेले ही वयस्कों की निर्णय लेने की स्वतंत्रता को दरकिनार करते हुए प्रभाव डाला हो.

अदालत ने कहा कि इसे अधिक से अधिक एक विशेष Political दल और उसके उम्मीदवार के लिए मतदान करने के लिए वयस्कों को राजी करने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है.

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एमएस/

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