
New Delhi, 15 सितंबर . social media, इंटरनेट और वर्चुअल वर्ल्ड में ‘जेनजी’ शब्द अचानक नहीं आया. इसका एक लंबा अरसा रहा है. देश-दुनिया में पिछले कुछ महीनों में ऐसी घटनाएं हुईं, जिसने जेनजी को मेनस्ट्रीम मीडिया, चर्चा और बयानों में भी शामिल कर दिया.
चाहे नेपाल, बांग्लादेश में जेनजी का प्रोटेस्ट हो या फिर जंतर-मंतर पर आंदोलन चला. जेनजी को लेकर बहुसंख्यक लोगों ने अपने हिसाब से परिभाषाएं गढ़ीं. उनके प्रदर्शन करने के तरीके और नारों को लेकर भी कई लोग नाखुश नजर आए.
एक तरफ जेनजी को बड़ी संख्या में लोग शक की निगाह से देखते हैं तो दूसरी तरफ social media पर कई वीडियोज सामने आए हैं, जिससे पता चला कि जेनजी भले ही अलग तरीके से सोचें, उनके सेलिब्रेशन का स्टाइल अछूता है. कहने का मतलब है कि उन्होंने पूजा और उत्सवों में India की संस्कृति को संभालकर रखा और उसी के हिसाब से न सिर्फ आयोजन कर रहे हैं, बल्कि उसमें शामिल भी हो रहे हैं.
दरअसल, जेनजी के लिए अलग दुनिया है, उनकी लैंग्वेज हो या बॉडी लैंग्वेज या खुद को एक्सप्रेस करने की काबिलियत, सब कुछ अलग दिखती है. अगर भक्ति की बात आए तो यहां भी जेनजी की ऐसी तस्वीर सामने आती है, जिसे देखकर आपको लगने लगेगा कि यह सही मायने में अलग पीढ़ी है, जो उन हंगामा करने वालों, हुड़दंगियों और खुद को असली जेनजी की तरह पेश करने वालों से बिल्कुल अलग है.
गणेश चतुर्थी पर देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी ही तस्वीरें सामने आईं, जहां जेनजी का विघ्नहर्ता के पूजा का अंदाज बिल्कुल अलग दिखा. भगवान को भोग में बादाम-कीवी से लेकर बटरस्कॉच फ्लेवर के मोदक और न्यूटेला व्हाइट चॉकलेट और लोटस बिसकॉप जैसे फ्लेवर्स की मिठाइयां चढ़ाई गई. जेनजी के सेलिब्रेशन का स्टाइल भी अलग हटकर रहा, लेकिन उसमें संस्कृति और धार्मिक मान्यताएं भी शामिल रहीं. गणपति उत्सव से जुड़ी कई फोटो और वीडियो social media पर सामने आए, जिसे देखकर लोग जेनजी के सेलिब्रेशन स्टाइल की तारीफें करते नहीं रुके.
जेनजी के सेलिब्रेशन में हुड़दंग, हंगामा और डीजे साउंड पर इधर-उधर कूदते-फांदते युवा दिखाए नहीं दिए. ढोल-नगाडों पर सेलिब्रेट करते इन युवाओं को देखकर हर कोई सिर्फ तारीफ ही करता रहा. इन वीडियोज और फोटोज को देखकर साफ पता चलता है कि युवा सेलिब्रेशन के मूड में थे, लेकिन दिमाग में यह भी था कि किसी को किसी तरह की परेशानी न हो. न उनके सेलिब्रेशन से और न ही इससे जुड़े किसी भी उत्साह से.
सबसे खास बात रही कि उत्सव के दौरान युवाओं ने संस्कार और धार्मिक क्रियाकलापों का बखूबी ध्यान रखा. बड़ों के साथ सम्मान से पेश आए और बच्चों के लिए भी संजीदगी दिखाई. पंडाल में व्यवस्था बनाए रखना और लोगों को सुगम दर्शन उपलब्ध कराना, इनका खास मकसद रहा.
इन आयोजनों के दौरान जो भी पंडाल में आए, उसे किसी तरह की दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा. जेनजी भले अलग हों, लेकिन, इस आधुनिक और डिजिटल वर्ल्ड में भी उन्होंने संस्कृति, नैतिक मूल्यों और धार्मिक आयोजनों के मूल को संभालकर और संजोकर रखा है.
(यह लेख मालिनी श्रीवास्तव ने लिखा है. इसमें व्यक्त किए गए विचार उनके हैं.)
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एबीएम/