कई मोर्चों पर संघर्ष के बीच मध्य पूर्व में सैन्य प्रतिबद्धताएं बढ़ा रहा पाकिस्तान: रिपोर्ट

इस्लामाबाद, 13 अक्टूबर . Pakistan पहले से ही कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रहा है, लेकिन इसके बावजूद वह मध्य पूर्व में अपनी सैन्य प्रतिबद्धताओं का विस्तार कर रहा है. एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर में Pakistan ने अफगानिस्तान के भीतर नए हवाई हमले किए, जबकि India सहित अन्य देशों के साथ उसके विवाद अब भी पूरी तरह सुलझे नहीं हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, 7 अगस्त को सऊदी अरब, Pakistan और तुर्किये ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. इसके तहत तीनों देशों में से किसी एक पर हमला होने को सभी तीन देशों पर हमला माना जाएगा.

Pakistan के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि यह समझौता सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करने और क्षेत्र तथा उससे बाहर शांति, सुरक्षा एवं स्थिरता को बढ़ावा देने के तीनों देशों के साझा संकल्प को दर्शाता है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि हूती विद्रोहियों के साथ सऊदी अरब का टकराव बढ़ने के बीच Pakistan अब केवल कूटनीतिक समर्थन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सैन्य सहयोग की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है. हालांकि, Pakistan ने अभी तक यमन में लड़ाई के लिए अपनी सेना तैनात करने का फैसला नहीं किया है.

यूरोपीय समाचार वेबसाइट ‘ईयू रिपोर्टर’ में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, Pakistan की भागीदारी रक्षा प्रतिबद्धताओं, सैन्य समन्वय, सलाहकारों और सैन्य सामग्री की आपूर्ति के जरिए बढ़ सकती है. रिपोर्ट में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि इन फैसलों पर संसद में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और निगरानी कितनी प्रभावी है.

‘ईयू रिपोर्टर’ में दिमित्रा स्टाइकू ने लिखा कि Pakistan ऐसे समय में मध्य पूर्व में अपनी सैन्य प्रतिबद्धताओं का विस्तार कर रहा है, जब वह पहले से मौजूद मोर्चों पर स्थिति नियंत्रित करने के लिए संघर्ष कर रहा है.

लेख के अनुसार, सितंबर के आखिर में Pakistan ने अफगानिस्तान के भीतर नए हवाई हमले किए. तालिबान Government के साथ टकराव और तहरीक-ए-तालिबान Pakistan (टीटीपी) से पैदा हो रहे खतरे ने Pakistan की पश्चिमी सीमा को सक्रिय संघर्ष क्षेत्र में बदल दिया है.

वहीं, पूर्वी सीमा पर India के साथ संबंध भी दबाव में हैं. लेख में कहा गया है कि वर्ष 2025 के गंभीर सैन्य टकराव के बाद तनाव कम करने की नाजुक प्रक्रिया जारी है, जबकि सिंधु जल संधि से जुड़ा विवाद भी अनसुलझा है.

लेखिका के मुताबिक, इसके बावजूद 5 अक्टूबर को इस्लामाबाद ने मक्का समझौते के तहत सऊदी अरब में सैन्य बलों और क्षमताओं की त्वरित तैनाती को लेकर तुर्किये के साथ सहमति जताई. लेख में यह भी दावा किया गया है कि हूतियों के खिलाफ सऊदी अरब के अभियानों में Pakistan का समर्थन कूटनीतिक एकजुटता से आगे बढ़कर सैन्य उपकरणों, सलाहकारों और अभियान संबंधी सहायता तक पहुंच चुका है.

स्टाइकू ने सवाल उठाया कि अफगानिस्तान की सीमा पर हवाई हमले करने और India के साथ बेहद नाजुक संबंधों का प्रबंधन करने के बीच Pakistan खाड़ी क्षेत्र में अपनी सैन्य जिम्मेदारियां क्यों बढ़ा रहा है. उन्होंने लिखा कि सऊदी अरब के पास Pakistanी सैन्य शक्ति का सहयोग लेने के स्पष्ट कारण हो सकते हैं, लेकिन यह कम स्पष्ट है कि एक और संघर्ष में धीरे-धीरे शामिल होने से Pakistan के किस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हित की पूर्ति होगी.

रिपोर्ट में वर्ष 2015 की घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है, जब सऊदी अरब ने यमन में अपने सैन्य हस्तक्षेप के लिए Pakistan से सैन्य सहायता मांगी थी.

उस समय यह मामला Pakistan की संसद में उठाया गया था. निर्वाचित सांसदों ने यमन संघर्ष में तटस्थ रहने का फैसला किया था. उनकी चिंता थी कि सैन्य हस्तक्षेप से ईरान के साथ Pakistan के संबंध खराब हो सकते हैं और देश के भीतर शिया तथा सुन्नी समुदायों के बीच तनाव बढ़ सकता है.

लेखिका ने वर्ष 2015 के फैसले की तुलना मौजूदा स्थिति से करते हुए कहा कि वर्ष 2026 में सैन्य प्रतिष्ठान की क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने, रणनीतिक प्रतिष्ठा हासिल करने और खाड़ी देशों के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा साझेदार बनने की महत्वाकांक्षाओं को देश के हितों के रूप में पेश किए जाने का खतरा है.

स्टाइकू ने लिखा कि Pakistan के सैन्य जनरलों के हितों को स्वत: ही Pakistan के राष्ट्रीय हितों के बराबर नहीं माना जा सकता. उनके अनुसार, जब निर्वाचित संस्थाओं के पास इन दोनों के बीच अंतर तय करने की शक्ति कम हो जाती है, तो जरूरत से ज्यादा रणनीतिक विस्तार केवल खराब विदेश नीति का मामला नहीं रह जाता, बल्कि यह भी दिखाता है कि वास्तव में देश पर शासन कौन कर रहा है.

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डीएससी

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