
New Delhi, 14 अक्टूबर . Enforcement Directorate (ईडी) के हेडक्वार्टर्स इन्वेस्टिगेशन यूनिट- II, New Delhi ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम, 2002 (पीएमएलए) के प्रावधानों के तहत ओशन सेवन बिल्डटेक प्राइवेट लिमिटेड (ओएसबीपीएल) के मामले में लगभग 136.42 करोड़ रुपए (1,36,41,74,559 रुपए) की संपत्ति जब्त की है.
जब्त की गई संपत्तियों में jaipur जिले के बिलोंची गांव और Rajasthan के कोटपूतली-बहरोड़ में स्थित जमीन के टुकड़े, गुरुग्राम के सेक्टर-102 में एक रिहायशी प्लॉट और कंपनी, उसके प्रमोटर स्वराज सिंह यादव और उनकी पत्नी सुनीता स्वराज के पांच बैंक खातों में जमा राशि शामिल है. वहीं, बैंक बैलेंस का चल हिस्सा 69,06,133 रुपए है, जिसे जोड़ने के बाद इस मामले में जब्त की गई संपत्तियों का कुल मूल्य बढ़कर लगभग 188 करोड़ हो गया है.
ईडी की जांच दिल्ली Police की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग, Haryana Police और Rajasthan Police द्वारा ओएसबीपीएल, उसके प्रमोटर स्वराज सिंह यादव और अन्य के खिलाफ दर्ज First Information Report के आधार पर शुरू की गई थी. इन First Information Report में कंपनी के रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स के संबंध में धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी और आपराधिक साजिश का आरोप लगाया गया था.
इससे पहले, इस निदेशालय ने प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर के तहत लगभग 51.57 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त की थी और विशेष न्यायालय (पीएमएलए), पटियाला हाउस कोर्ट, New Delhi के समक्ष 9 जनवरी 2026 को अभियोजन शिकायत दायर की थी.
ईडी की जांच से पता चला है कि ओएसबीपीएल दिसंबर 2006 से मार्च 2015 के दौरान कंपनी ने Rajasthan में अपने चार प्रोजेक्ट्स – jaipur के बिलोंची गांव में ‘एम्बर गार्डन’ और कोटपुतली-बहरोड़ में ‘कोट रेजिडेंसी’, ‘कोट फार्म्स’ और ‘कोट इंडस्ट्रियल एस्टेट’ के लिए प्लॉट खरीदारों से 118 करोड़ रुपए से ज्यादा जमा किए.
यह पैसा इस वादे पर लिया गया था कि प्रोजेक्ट्स को डेवलप किया जाएगा और अलॉट किए गए प्लॉट का कब्जा लगभग तीन से चार वर्ष के अंदर सौंप दिया जाएगा. ‘एम्बर गार्डन’ प्रोजेक्ट में खरीदारों से पैसे जमा करने का काम दिसंबर 2006 में ही शुरू हो गया था, जबकि ओएसबीपीएल ने jaipur डेवलपमेंट अथॉरिटी (जेडीए) में प्रोजेक्ट के नक्शे के लिए आवेदन भी नहीं किया था.
जेडीए और रेवेन्यू अथॉरिटीज की साइट इंस्पेक्शन से पता चला है कि प्रोजेक्ट्स कभी डेवलप ही नहीं किए गए और साइट्स का ज्यादातर हिस्सा खाली पड़ा है. जिन खरीदारों ने पूरी कीमत चुका दी थी और कई मामलों में रजिस्टर्ड कन्वेयंस डीड और कब्जा पत्र भी हासिल कर लिए थे, उन्हें कभी कब्जा नहीं दिया गया और उनके प्लॉट का सीमांकन भी कभी नहीं किया गया.
इन प्रोजेक्ट्स के डेवलपमेंट में इस्तेमाल होने के बजाय, फंड्स को डेवलपमेंट से अलग कामों में लगा दिया गया, जैसे गुरुग्राम में कंपनी के लिए ऑफिस की जगह खरीदना और दूसरे प्रोजेक्ट्स के लिए एडवांस देना. जांच में यह भी पता चला है कि First Information Report दर्ज होने के बाद, जून और सितंबर 2025 के बीच आरोपी कंपनी और उसके प्रमोटर्स की लगभग 39 एकड़ जमीन उनके करीबी सहयोगियों या तीसरे पक्ष के व्यक्तियों/संस्थाओं के नाम कर दी गई. उन प्रॉपर्टीज को भी प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर के तहत जब्त कर लिया गया है.
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डीके/डीकेपी