
रेक्याविक (आइसलैंड), 10 अक्टूबर . आर्कटिक क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का असर India के मानसून, कृषि, जल संसाधनों और करोड़ों लोगों की आजीविका पर पड़ सकता है. India ने इस संबंध को बेहतर ढंग से समझने के लिए आर्कटिक, हिमालय और अंटार्कटिका में वैज्ञानिक अनुसंधान तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया है.
विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने 8 अक्टूबर को आर्कटिक सर्कल असेंबली 2026 में ‘आर्कटिक और जलवायु परिवर्तन : पर्यवेक्षक देशों के दृष्टिकोण’ विषय पर आयोजित पैनल में अपने शुरुआती संबोधन में यह बात कही. Saturday को विदेश मंत्रालय ने उनका संबोधन जारी कर बताया कि उन्होंने भारत, जापान और दक्षिण कोरिया के बीच ध्रुवीय क्षेत्रों से जुड़े अनुसंधान, वैज्ञानिक आंकड़ों के आदान-प्रदान और संयुक्त अभियानों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं सामने रखीं.
कीर्ति वर्धन सिंह ने कहा, ” जलवायु प्रणाली की सीमाएं भौगोलिक दूरी से तय नहीं होतीं. आर्कटिक India से काफी दूर है, लेकिन वहां होने वाले बदलावों का प्रभाव ध्रुवीय क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता. भारतीय मानसून पर महासागरों, वायुमंडल, जमीन, बर्फ और हिम के बीच होने वाली जटिल प्रक्रियाओं का असर पड़ता है. वैज्ञानिक इस बात का अध्ययन कर रहे हैं कि आर्कटिक में बदलाव यूरेशिया के वायुमंडलीय परिसंचरण को किस तरह प्रभावित कर सकते हैं और इसका भारतीय मानसून से क्या संबंध है.”
उन्होंने स्पष्ट किया कि इस संबंध को लेकर अभी सभी सवालों के जवाब नहीं मिले हैं. हालांकि, India के लिए इस दिशा में लगातार अनुसंधान करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि मानसून का सीधा संबंध कृषि उत्पादन, जल संसाधनों, ऊर्जा और करोड़ों लोगों की आजीविका से है. इसके लिए लंबे समय तक वैज्ञानिक निगरानी, निरंतर शोध और विश्वसनीय आंकड़ों की जरूरत है.
विदेश राज्य मंत्री ने बताया, “India की आर्कटिक वैज्ञानिक यात्रा 2007 में शुरू हुई थी. इसके बाद 2008 में नॉर्वे के न्य-ऑलेसंड में हिमाद्रि अनुसंधान केंद्र स्थापित किया गया. India 2013 में आर्कटिक परिषद का पर्यवेक्षक बना और 2014 में वहां अपना अंडरवाटर ऑब्जर्वेटरी स्थापित किया. दिसंबर 2023 से भारतीय वैज्ञानिकों ने हिमाद्रि में सर्दियों के दौरान भी अनुसंधान अभियान शुरू किए हैं.”
उन्होंने India के प्रयासों का जिक्र करते हुए आगे कहा, “India का अनुसंधान केवल आर्कटिक तक सीमित नहीं है. हिमालय में स्थित हिमांश अनुसंधान केंद्र और अंटार्कटिका में मैत्री तथा भारती अनुसंधान केंद्र भी पृथ्वी की जलवायु प्रणाली को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.”
कीर्ति वर्धन सिंह ने जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान के बारे में कहा, ” आर्कटिक की समुद्री बर्फ, पर्माफ्रॉस्ट यानी लंबे समय तक जमी रहने वाली जमीन और ग्लेशियरों में बदलाव का वैश्विक जलवायु प्रणाली पर व्यापक प्रभाव पड़ता है. दूसरी ओर, हिमालय में ग्लेशियरों के पीछे हटने और बर्फ की मात्रा घटने से पारिस्थितिकी तंत्र, नदियों में पानी की उपलब्धता, स्थानीय समुदायों और बुनियादी ढांचे पर असर पड़ सकता है.”
उन्होंने आर्कटिक के मूल निवासियों और हिमालयी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को भी महत्वपूर्ण बताया. उनके मुताबिक, “इन समुदायों ने पीढ़ियों से बदलते पर्यावरण के अनुरूप जीवन जीने के अनुभव हासिल किए हैं. वैज्ञानिक अनुसंधान और पारंपरिक ज्ञान के बीच संवाद बढ़ाने से जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक खतरों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिल सकती है.” हालांकि, उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि अलग-अलग क्षेत्रों की विशिष्ट परिस्थितियों और ज्ञान प्रणालियों का सम्मान किया जाना चाहिए.
आर्कटिक में समुद्री बर्फ की स्थिति बदलने से नए समुद्री मार्गों, शिपिंग और बुनियादी ढांचे के विकास की संभावनाएं भी उभर रही हैं. लेकिन इनके साथ नए पर्यावरणीय जोखिम भी जुड़े हैं. India इन घटनाक्रमों का अध्ययन अंतरराष्ट्रीय कानून, आर्कटिक पर्यावरण की सुरक्षा और क्षेत्र के समुदायों के हितों को ध्यान में रखते हुए करना चाहता है.
विदेश राज्य मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (यूएनसीएलओएस) और आर्कटिक परिषद की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि India एक पर्यवेक्षक देश के रूप में आर्कटिक देशों और वहां के मूल निवासियों की विशेष भूमिका को स्वीकार करता है. India का उद्देश्य अपने वैज्ञानिक अनुभव से योगदान देना, दूसरे देशों के अनुभवों से सीखना और ज्ञान के माध्यम से सहयोग मजबूत करना है.
भारत, जापान और दक्षिण कोरिया के बीच वैज्ञानिक सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा करते हुए उन्होंने कई प्रस्ताव रखे. इनमें संयुक्त वैज्ञानिक अभियान, अनुसंधान सुविधाओं का साझा उपयोग, वैज्ञानिक अवलोकनों और आंकड़ों का व्यवस्थित आदान-प्रदान तथा आर्कटिक और हिमालय में तुलनात्मक अनुसंधान पद्धतियों का विकास शामिल है. उन्होंने युवा वैज्ञानिकों को एक-दूसरे के संस्थानों में काम करने के अधिक अवसर देने का भी सुझाव दिया.
उन्होंने कहा कि वर्ष 2032-33 में प्रस्तावित अगले अंतरराष्ट्रीय ध्रुवीय वर्ष को दीर्घकालिक वैज्ञानिक साझेदारी विकसित करने के लक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे तीनों देशों के वैज्ञानिकों को साझा अनुसंधान कार्यक्रमों और दीर्घकालिक अवलोकन परियोजनाओं के लिए तैयार होने का अवसर मिलेगा.
कीर्ति वर्धन सिंह ने ध्रुवीय और हिममंडलीय विज्ञान में क्षमता निर्माण की आवश्यकता पर भी जोर दिया. उन्होंने कहा, “India मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्स और अन्य डिजिटल कार्यक्रमों के माध्यम से शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है. इन मंचों के जरिए प्रशिक्षण सामग्री, शैक्षणिक संसाधनों और वैज्ञानिक विशेषज्ञता का आदान-प्रदान किया जा सकता है.”
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा समर्थित 2025-2034 के ‘हिममंडलीय विज्ञान दशक’ को इस दिशा में काम आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण अवसर बताया. उनके अनुसार, इस पहल के तहत बेहतर निगरानी नेटवर्क विकसित करने, वैज्ञानिक आंकड़ों को साझा करने की व्यवस्था मजबूत करने, आर्कटिक-हिमालय अनुसंधान बढ़ाने और युवा वैज्ञानिकों के बीच स्थायी साझेदारी बनाने पर काम किया जा सकता है.
विदेश राज्य मंत्री ने कहा कि वैज्ञानिक सहयोग का वास्तविक महत्व बेहतर समझ विकसित करने और उसके आधार पर नीतिगत निर्णय लेने में है. ग्लेशियरों की बेहतर निगरानी से शुरुआती चेतावनी प्रणालियों को मजबूत किया जा सकता है, जबकि पर्माफ्रॉस्ट पर बेहतर जानकारी बुनियादी ढांचे की योजना बनाने में मदद कर सकती है. इसी तरह, आर्कटिक और भारतीय मानसून के बीच संबंधों की बेहतर समझ से जलवायु अनुसंधान और भविष्य की तैयारी को मजबूती मिल सकती है.
उन्होंने कहा कि India भौगोलिक रूप से आर्कटिक से दूर जरूर है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से उससे जुड़ा हुआ है. India एक पर्यवेक्षक देश के रूप में सक्रिय और रचनात्मक भूमिका निभाना चाहता है. आर्कटिक को एक अलग-थलग क्षेत्र के बजाय पृथ्वी की व्यापक जलवायु प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हुए India ऐसे व्यावहारिक सहयोग को आगे बढ़ाना चाहता है, जिससे बेहतर विज्ञान, मजबूत अनुसंधान क्षमता और दुनिया भर के समुदायों के लिए उपयोगी ज्ञान विकसित किया जा सके.
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केआर/