आरएसएस में जाति या रुतबा नहीं, मेहनत से आगे बढ़ने का मौका: इजरायली शोधकर्ता येशाया रोसेनमैन

New Delhi, 18 अक्टूबर . इजरायली शोधकर्ता येशाया रोसेनमैन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ अपने अनुभव को सकारात्मक बताते हुए संगठन में मेहनत, समर्पण और सामाजिक कार्यों की सराहना की है. से बात करते हुए उन्होंने आरएसएस को अपने नजरिए से समझाया. उनके मुताबिक आगे बढ़ने का आधार किसी विशेष जाति या आर्थिक संपन्नता के बजाय मेहनत होना चाहिए. उन्होंने Prime Minister Narendra Modi को इसका प्रमुख उदाहरण बताया.
आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने पर प्रकाशित पुस्तक ‘हंड्रेड इयर्स यंग: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ में उपलब्धि हासिल करने वाले 18 युवाओं में रोसेनमैन का नाम भी शामिल है. संगठन के साथ अपने अनुभव के बारे में उन्होंने कहा, “वहां के लोग मित्रवत और दिल खोलकर आपका स्वागत करने वाले हैं. संगठन में मेरे मित्र हैं, जिनसे मैं मिलता रहता हूं. मैं सबसे अधिक प्रभावित संगठन के लोगों का अपने उद्देश्य के प्रति समर्पण देख कर होता हूं.”
रोसेनमैन के अनुसार, संगठन के लोग किसी भौतिक लाभ या दूसरे स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि अपने उद्देश्य के प्रति ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ काम करते हैं. उन्होंने कहा, “आरएसएस में किसी व्यक्ति की प्रगति उसकी मेहनत और योग्यता के आधार पर होनी चाहिए. Prime Minister मोदी इसका उदाहरण है. पीएम मोदी अपनी कार्यशैली और उपलब्धियों के दम पर आगे बढ़ते रहे.”
रोसेनमैन ने कहा, “पश्चिमी देशों में India के बारे में जानकारी सीमित होने के बावजूद पीएम मोदी एक अंतरराष्ट्रीय ब्रांड बन चुके हैं. आम तौर पर, पश्चिमी देशों के लोग India के बारे में बहुत कम जानते हैं; वे बस ताजमहल, महात्मा गांधी और मोदी को जानते हैं. इसलिए, वे जानते हैं कि वह एक अंतरराष्ट्रीय ब्रांड हैं, और यह बात अपने आप में बहुत कुछ कह जाती है. इसके साथ ही सम्मान भी जुड़ा है. Prime Minister की वैश्विक पहचान के साथ India का मान सम्मान भी बढ़ा है.”
उन्होंने कहा कि India में पीएम मोदी के प्रति समर्थन को समझने के लिए विकास और सुशासन के पहलुओं पर भी ध्यान देना चाहिए. स्वच्छ पेयजल, शौचालय, रसोई गैस, बैंक खाते और बुनियादी ढांचे में हुए बदलावों का उल्लेख करते हुए कहा, “इन क्षेत्रों में हुए परिवर्तन आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं. कई भारतीयों के लिए विकास और बेहतर प्रशासन, विचारधारा से पहले महत्व रखते हैं.”
आरएसएस के सामाजिक कार्यों का भी उल्लेख भी इजरायली शोधकर्ता ने किया और कहा कि संगठन का काम केवल विचारधारा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सामाजिक गतिविधियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है.
आरएसएस की सांस्कृतिक भूमिका पर रोसेनमैन ने कहा, “संगठन भारतीय सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने और उसे आगे बढ़ाने में भूमिका निभाता है.” संगठन के बारे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित धारणाओं को लेकर उन्होंने कहा कि करीब से समझने के लिए उसके सदस्यों से सीधे बातचीत करना और उसके इतिहास तथा व्यापक सामाजिक परिवेश को जानना जरूरी है.
उन्होंने पश्चिमी देशों के लोगों से India की सभ्यता, इतिहास, गणित, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत को पूर्वाग्रह के बिना समझने की अपील की. उनके अनुसार, भारतीय और पश्चिमी सभ्यताओं के बीच कुछ साझा विचार और मूल्य भी हैं. उन्होंने कहा कि दोनों के बीच संवाद और सहयोग से सांस्कृतिक समझ को बढ़ाया जा सकता है.
रोसेनमैन ने यह भी कहा कि आरएसएस को लेकर राय बनाने से पहले लोगों को संगठन के सदस्यों से सीधे बातचीत करनी चाहिए, न कि केवल तीसरे पक्ष के माध्यम से मिली जानकारी पर निर्भर रहना चाहिए. India की सांस्कृतिक विरासत को समझने से देश और उसकी संस्थाओं के बारे में व्यापक दृष्टिकोण विकसित हो सकता है.
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केआर/


