बांग्लादेश: डीपफेक कंटेंट में महिलाओं को बनाया जा रहा निशाना, समाज से अलग करना है मकसद

ढाका, 25 अप्रैल . बांग्लादेश में तकनीक के गलत इस्तेमाल में धीरे-धीरे खतरनाक बढ़ोतरी देखी जा रही है. दरअसल, देश में आपत्तिजनक कंटेंट पर महिलाओं के चेहरे लगाकर उन्हें टारगेट करने की घटनाएं बढ़ रही हैं. इसका मकसद उन महिलाओं को समाज से अलग करना है, जो अपने हक के लिए आवाज उठाना जानती हैं.

एक रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से डीपफेक कंटेंट में मुख्य रूप से महिलाओं को टारगेट किया जा रहा है. डीपफेक की वजह से पीड़ितों को ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार को काफी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है. इसकी वजह से समाज में छवि का नुकसान हो रहा है और पीड़ित परिवार खुद को पब्लिक लाइफ से अलग करने पर मजबूर हो जाता है. इसके अलावा कई मामलों में तो पीड़ित अपनी जिंदगी खत्म कर लेता है.

बांग्लादेशी अखबार ‘डेली सन’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, डीपफेक के पीड़ित अलग-अलग कैटेगरी से आते हैं, जिनमें छात्र, कार्यकर्ता, प्रोफेशनल, राजनेता, एक्ट्रेस और अन्य आम लोग शामिल हैं.

रिपोर्ट में बताया गया है, “बांग्लादेश में दर्ज सबसे भयानक मामलों में से एक में, एक महिला ने अपनी जान ले ली. पीड़ित महिला का एआई-एडिटेड वीडियो उसके परिवार के साथ शेयर किया गया. अपराधी अच्छी तरह समझता था कि बांग्लादेशी सोशल स्ट्रक्चर कैसे काम करते हैं. परिवार की इज्जत, समुदाय का फैसला और डिजिटल शर्म की ऐसी हालत पीड़ित के लिए सुकून से रहना मुश्किल कर देते हैं. ऐसे में आरोपी ने एक बनाए हुए डीपफेक वीडियो का इस्तेमाल करके पीड़ित को निशाना बनाया. उसकी मौत तकनीक की वजह से हुई कोई दुर्घटना नहीं थी. यह इसके जानबूझकर गलत इस्तेमाल का नतीजा थी.”

एक और मामले का जिक्र करते हुए रिपोर्ट में राजशाही यूनिवर्सिटी की छात्र रिया का जिक्र किया गया. यह पीड़ित का असली नाम नहीं है. रिया का चेहरा आपत्तिजनक कंटेंट में लगाया गया और स्टूडेंट नेटवर्क में सर्कुलेट किया गया.

रिपोर्ट में बताया गया, “यह कंटेंट दोस्तों और रिश्तेदारों तक फैल गया. उस पर हर उस छात्र संगठन से इस्तीफा देने का दबाव डाला गया, जिससे वह जुड़ी थी. उसकी मां ने उसे अपनी पढ़ाई और कैंपस छोड़ने के लिए कहा. रिया कानूनी मदद चाहती थी, लेकिन उसे डर था कि शिकायत करने से मीडिया का ध्यान जाएगा और नुकसान बढ़ जाएगा. उसने कुछ नहीं किया. कंटेंट बना रहा.”

बांग्लादेश के पर्यावरण मंत्रालय की पूर्व सलाहकार सैयदा रिजवाना हसन को 2025 की शुरुआत में तब टारगेट किया गया जब एक डॉक्टर्ड तस्वीर को ‘केमिकल अली नाम के एक अकाउंट के जरिए social media प्लेटफॉर्म पर बड़े पैमाने पर सर्कुलेट किया गया. यह अकाउंट बार-बार जानी-मानी महिलाओं को टारगेट करने के लिए जाना जाता है. इसमें एक एडल्ट वेबसाइट से लिए गए शरीर पर पीड़ित का चेहरा लगाया गया था.

तकनीक से होने वाली लिंग आधारित हिंसा (टीएपजीबीवी) के खिलाफ मजबूत और डिजिटल डेवलपमेंट को बढ़ावा देने के नतीजों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि बांग्लादेश में 89 फीसदी महिला social media यूजर्स ने कम से कम एक बार ऑनलाइन हिंसा का सामना किया है.

इसमें आगे कहा गया है कि बांग्लादेश में डीपफेक करने वालों की प्रोफाइल से अपराधियों की एक बड़ी और परेशान करने वाली रेंज का पता चलता है.

रिपोर्ट में बताया गया, “ज्यादातर मामलों में उगाही करने वाला एक व्यक्ति होता है, जो अक्सर पीड़ित का परिचित होता है या फिर ऑनलाइन संपर्क में आया होता है. वह social media से फोटो डाउनलोड करता है, डीपफेक टूल का इस्तेमाल करके आपत्तिजनक कंटेंट बनाता है और फिर विक्टिम से संपर्क करके धमकी देता है: पैसे दो, बात मानो, वरना वीडियो तुम्हारे परिवार, तुम्हारे कॉलेज, तुम्हारे एम्प्लॉयर के पास चला जाएगा.”

इस रिपोर्ट में बांग्लादेश के ह्यूमन राइट्स ग्रुप वॉइस की पिछले साल की एक स्टडी का भी जिक्र किया गया. इस स्टडी में दिखाया गया कि महिला कार्यकर्ता और महिला Governmentी सलाहकारों के खिलाफ कोऑर्डिनेटेड डिजिटल हमलों का मकसद सिर्फ उन्हें बेइज्जत करना नहीं है, बल्कि उन्हें पूरी तरह से पब्लिक लाइफ से बाहर करना है.

केके/डीकेपी

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