
Mumbai , 28 मई . हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की दुनिया में हीराबाई बडोदेकर का नाम बेहद ही सम्मान के साथ लिया जाता है. उन्होंने उस दौर में महिलाओं के लिए नई राह भी बनाई, जब मंच पर आकर गाना महिलाओं के लिए आसान नहीं माना जाता था. आज शास्त्रीय संगीत के बड़े-बड़े कार्यक्रमों में महिला कलाकारों की मजबूत मौजूदगी दिखाई देती है, लेकिन एक समय ऐसा था जब महिलाओं को सार्वजनिक मंचों पर गाने में कई सामाजिक मुश्किलों का सामना करना पड़ता था. ऐसे दौर में हीराबाई बडोदेकर ने हिम्मत दिखाई और टिकट लेकर सार्वजनिक संगीत कार्यक्रम करने वाली शुरुआती महिला कलाकारों में अपनी जगह बनाई. उनकी इस पहल ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को आम लोगों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई.
हीराबाई बडोदेकर का जन्म 29 मई 1905 को Maharashtra में हुआ था. उनका असली नाम चंपाकली था. घर में संगीत का माहौल होने के कारण बचपन से ही उनका झुकाव गायन की ओर हो गया था. उन्होंने उस्ताद अब्दुल वहीद खान, रामकृष्णबुवा वझे और अन्य बड़े संगीत गुरुओं से शिक्षा ली. उनकी आवाज बेहद मधुर थी. यही वजह थी कि कम उम्र में ही लोग उनकी गायकी के दीवाने हो गए थे.
हीराबाई ख्याल गायकी की महान कलाकार थीं, लेकिन उनकी प्रतिभा सिर्फ वहीं तक सीमित नहीं थी. उन्होंने ठुमरी, भजन, भावगीत और नाट्य संगीत में भी अपनी अलग पहचान बनाई. मंच पर उनकी प्रस्तुति इतनी प्रभावशाली होती थी कि श्रोता मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते रहते थे.
उस समय महिलाओं के लिए मंच पर आकर टिकट वाले कार्यक्रम करना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी. समाज में इसे लेकर कई तरह की धारणाएं थीं. लेकिन हीराबाई ने इन सब बातों की परवाह किए बिना संगीत को सम्मानजनक रूप में लोगों के सामने पेश किया. उन्होंने अपने कार्यक्रमों को अनुशासन और गरिमा के साथ आयोजित किया. लोग टिकट खरीदकर उनकी गायकी सुनने पहुंचते थे और धीरे-धीरे उनका नाम पूरे देश में प्रसिद्ध हो गया. उनकी इस पहल ने आने वाली महिला कलाकारों के लिए रास्ता आसान बना दिया. यही कारण है कि उन्हें India में महिला संगीत कार्यक्रमों की नई पहचान देने वाली कलाकारों में गिना जाता है.
संगीत के अलावा, हीराबाई मराठी रंगमंच और फिल्मों से भी जुड़ी रहीं. उन्होंने ‘सुवर्ण मंदिर’, ‘प्रतिभा’ और ‘जनाबाई’ जैसी फिल्मों में काम किया. साथ ही कई संगीत नाटकों में अभिनय और गायन से दर्शकों का दिल जीता.
हीराबाई ने ‘नूतन संगीत विद्यालय’ नाम का संगीत स्कूल भी शुरू किया, जहां लड़कियों को शास्त्रीय संगीत सिखाया जाता था. उस दौर में लड़कियों को संगीत की शिक्षा देने का उनका यह कदम काफी सराहनीय माना गया. उन्होंने कई बड़े कलाकारों को तैयार किया. डॉ. प्रभा अत्रे जैसी प्रसिद्ध गायिका उनकी शिष्या रहीं.
देश की आजादी के ऐतिहासिक दिन 15 अगस्त 1947 को लाल किले से ‘वंदे मातरम्’ गाने का सम्मान भी हीराबाई बडोदेकर को मिला था. यह उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक माना जाता है. संगीत में उनके योगदान के लिए India Government ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया. इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई बड़े सम्मान मिले.
20 नवंबर 1989 को हीराबाई बडोदेकर का निधन हो गया.
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पीके/डीएससी