
Mumbai , 19 फरवरी . हिंदी सिनेमा में कई ऐसे कलाकार हुए हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर अलग पहचान बनाई. अन्नू कपूर उन्हीं कलाकारों में से एक हैं. वह अपने अभिनय से लोगों का दिल बेहद आसानी से जीत लेते हैं. उन्होंने बेहद कम उम्र में बुजुर्ग शख्स का ऐसा किरदार निभाया था कि उन्होंने दर्शकों के साथ-साथ निर्देशकों का ध्यान भी अपनी ओर खींचा था. बस, ये वही मोड़ था, जिसने आगे चलकर उनके फिल्मी सफर का रास्ता खोल दिया.
अन्नू कपूर का जन्म 20 फरवरी 1956 को Madhya Pradesh की राजधानी Bhopal में हुआ था. उनका असली नाम अनिल कपूर है. उनके पिता मदनलाल एक पारसी थिएटर कंपनी चलाते थे और उनकी मां उर्दू की शिक्षिका थीं. घर का माहौल कला और साहित्य से जुड़ा हुआ था, लेकिन आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी. परिवार ने कई मुश्किल दौर देखे. पढ़ाई के दौरान ही हालात ऐसे बने कि उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा.
युवावस्था में उन्होंने रंगमंच का रुख किया और बाद में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) में दाखिला लिया. यहीं से उनके अभिनय को असली दिशा मिली. महज 22 साल की उम्र में उन्होंने एक नाटक में 70 साल के बुजुर्ग का किरदार निभाया. उनके अभिनय को देख दर्शक हैरान रह गए. इसी दौरान प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल भी उनके अभिनय से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अन्नू कपूर को अपनी फिल्म ‘मंडी’ के लिए साइन कर लिया. यह उनके फिल्मी करियर की बड़ी शुरुआत थी.
फिल्मों में आने के बाद अन्नू कपूर ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. 1984 में आई फिल्म ‘उत्सव’ से उन्हें खास पहचान मिली. इसके बाद उन्होंने ‘मिस्टर इंडिया’, ‘तेजाब’, और ‘राम लखन’ जैसी फिल्मों में यादगार भूमिकाएं निभाईं. वे मुख्य Actor भले न रहे हों, लेकिन उन्होंने हर किरदार को अपनी अलग शैली से खास बना दिया. उनकी कॉमिक टाइमिंग और डायलॉग बोलने का अंदाज दर्शकों को खूब पसंद आया.
साल 2012 में आई फिल्म ‘विक्की डोनर’ उनके करियर का अहम पड़ाव साबित हुई. इस फिल्म में डॉक्टर बलदेव चड्ढा के किरदार के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार सहित कई बड़े सम्मान मिले. फिल्मों के अलावा उन्होंने टीवी पर ‘अंताक्षरी’ जैसे लोकप्रिय शो होस्ट किए और रेडियो पर भी अपनी अलग पहचान बनाई.
अन्नू कपूर का करियर चार दशक से अधिक लंबा है, और वह आज भी सक्रिय हैं.
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पीके/डीकेपी