
चेन्नई, 31 मई . मां और बच्चे की सेहत की देखभाल के मामले में तमिलनाडु देश के सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले राज्यों में से एक बनकर उभरा है.
अब तमिलनाडु में लगभग हर बच्चे का जन्म किसी मेडिकल संस्थान में होता है. राज्य ने अपनी कई पुरानी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों पर काफी हद तक काबू पा लिया है. लेकिन बढ़ते मोटापा, मधुमेह और अन्य गैर-संक्रामक बीमारियों से चिंता बढ़ी है.
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के छठे दौर के अनुसार, तमिलनाडु में संस्थागत प्रसव (अस्पतालों में होने वाले प्रसव) का आंकड़ा बढ़कर 99.7 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो कि राष्ट्रीय औसत 90.6 प्रतिशत से काफी अधिक है.
ग्रामीण क्षेत्रों में 99.6 और शहरी क्षेत्रों में 99.8 प्रतिशत संस्थागत प्रसव हो रहे हैं. इन उपलब्धियों के बावजूद, यह सर्वे कुछ बीमारियों में चिंता बढ़ा रही हैं.
बता दें कि तमिलनाडु देश के सबसे अधिक मोटापे वाले राज्यों में से एक है. 15-49 वर्ष आयु वर्ग की लगभग 44.2 प्रतिशत महिलाएं अधिक वजन वाली या मोटापे से ग्रस्त हैं. यह आंकड़ा पिछले सर्वे के 40.5 प्रतिशत से बढ़ा है और राष्ट्रीय औसत 30.7 प्रतिशत से काफी अधिक है. शहरी क्षेत्रों में, लगभग हर दूसरी महिला इसी श्रेणी में आती है. पुरुषों में, 38.8 प्रतिशत लोग अधिक वजन वाले या मोटापे से ग्रस्त हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 27.3 प्रतिशत है.
मधुमेह के बढ़ते मामले भी इसके लिए जिम्मेदार हैं. राज्य में लगभग 25.2 प्रतिशत महिलाओं और 26.7 प्रतिशत पुरुषों में रक्त शर्करा (ब्लड शुगर) का स्तर उच्च या बहुत उच्च पाया गया है; ये दोनों ही आंकड़े राष्ट्रीय औसत से अधिक हैं.
जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ये आंकड़े आने वाले वर्षों में अस्पतालों में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या में वृद्धि, स्वास्थ्य सेवाओं की लागत में बढ़ोतरी और समय से पहले होने वाली मौतों के बोझ में वृद्धि का कारण बन सकते हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन की पूर्व मुख्य वैज्ञानिक डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों को सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया है. उन्होंने रोकथाम, शीघ्र निदान और समय पर उचित हस्तक्षेप पर विशेष ध्यान देने की बात कही है. उन्होंने कहा कि किसी भी बीमारी के गंभीर रूप धारण करने से पहले ही उसकी रोकथाम करना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए.
यह सर्वे ‘जेस्टेशनल डायबिटीज’ (गर्भावस्था के दौरान होने वाला मधुमेह) और ‘प्रेग्नेंसी-इंड्यूस्ड हाइपरटेंशन’ (गर्भावस्था के कारण होने वाला उच्च रक्तचाप) की बढ़ती दरों की ओर भी संकेत करता है. इससे ‘सीजेरियन’ (ऑपरेशन द्वारा) प्रसवों की संख्या बढ़ रही है.
तमिलनाडु में अब लगभग 46.9 प्रतिशत प्रसव ‘सीजेरियन सेक्शन’ (ऑपरेशन) के माध्यम से होते हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 27.2 प्रतिशत है. Governmentी अस्पतालों में सर्जिकल प्रसवों की संख्या में वृद्धि हुई है. स्वास्थ्य सेवा विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर किए गए उचित हस्तक्षेपों ने मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. हालांकि, विशेषज्ञ प्रसव-पूर्व देखभाल में आई गिरावट को लेकर चिंतित हैं.
गर्भावस्था की पहली तिमाही के दौरान शुरुआती पंजीकरण 77.4 प्रतिशत से घटकर 71.2 प्रतिशत हो गया है, जबकि प्रसव-पूर्व कम से कम चार जांचें पूरी करने वाली महिलाओं का अनुपात 90.6 प्रतिशत से घटकर 87.6 प्रतिशत रह गया है. हालांकि, ज्यादातर महिलाएं अंततः बच्चे के जन्म के लिए अस्पताल पहुंच जाती हैं, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि प्रसव-पूर्व देखभाल में देरी से मां और बच्चे के स्वास्थ्य पर लंबे समय तक बुरा असर पड़ सकता है.
इन नतीजों से पता चलता है कि तमिलनाडु के सामने अगली सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को बेहतर बनाना नहीं होगी, बल्कि जीवनशैली से जुड़ी बढ़ती बीमारियों से निPatna होगी; और साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान समय पर उचित देखभाल मिलती रहे.
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एसडी/पीएम