
New Delhi, 13 मई . Supreme Court ने Wednesday को 31 वर्षीय हरीश राणा के परिवार की सराहना की. अदालत ने कहा कि बेटे की मौत के बाद उसके अंग दान करने का फैसला मानवता और करुणा का बड़ा उदाहरण है.
हरीश राणा को करीब 13 साल तक कोमा जैसी स्थिति में रहने के बाद Supreme Court ने मार्च में लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दी थी.
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच को बताया गया कि हरीश राणा का 24 मार्च को निधन हो गया. उन्हें Supreme Court के 11 मार्च के आदेश के बाद दिल्ली के एम्स अस्पताल के पेलिएटिव केयर यूनिट में भर्ती कराया गया था.
परिवार की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि हरीश राणा का डेथ सर्टिफिकेट रिकॉर्ड में जमा कर दिया गया है. उन्होंने यह भी बताया कि मौत के बाद हरीश की हार्ट वाल्व और आंखों की कॉर्निया दान की गईं, क्योंकि यही अंग दान के योग्य पाए गए.
Supreme Court ने कहा कि परिवार ने अपूरणीय दुख सहने के बावजूद अंगदान कर बहुत बड़ा और निस्वार्थ काम किया है. अदालत ने कहा कि हरीश ने ‘प्यार और करुणा’ के साथ दुनिया को अलविदा कहा और उनके अंगदान से कई लोगों की जिंदगी में रोशनी आएगी.
अदालत ने यह भी कहा कि बिना जरूरत लंबे समय तक मशीनों और ट्यूबों के सहारे जीवन बढ़ाना हमेशा सम्मानजनक देखभाल नहीं माना जा सकता. यह मामला दिखाता है कि चिकित्सा विज्ञान की भी सीमाएं हैं और व्यक्ति की गरिमा व इच्छा का सम्मान जरूरी है.
बेंच ने कहा, ”इस मामले ने सभी को बहुत कुछ सिखाया है, हमें जज के रूप में भी.”
Supreme Court ने निर्देश दिया कि हरीश राणा का डेथ सर्टिफिकेट तीन साल तक केस रिकॉर्ड में सुरक्षित रखा जाए. साथ ही एम्स की रिपोर्ट को सीलबंद लिफाफे में रखने का आदेश दिया.
अदालत ने एम्स के डॉक्टरों, परिवार की ओर से पेश वकील रश्मि नंदकुमार और केंद्र Government की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी की भी सराहना की.
Supreme Court ने केंद्र Government को जुलाई तक इस मामले में पहले दिए गए निर्देशों के पालन पर नई स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है.
दरअसल, हरीश राणा को 13 साल पहले चौथी मंजिल से गिरने के बाद गंभीर सिर की चोट लगी थी.
मेडिकल बोर्ड ने बताया था कि वह स्थायी वेजिटेटिव स्टेट में थे, उन्हें 100 प्रतिशत दिव्यांगता और पूरे शरीर में लकवे जैसी स्थिति थी. सांस लेने और खाना देने के लिए लगातार मेडिकल सपोर्ट की जरूरत थी और ठीक होने की संभावना लगभग नहीं थी.
हरीश के माता-पिता ने पहले दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर पैसिव यूथेनेशिया पर विचार करने के लिए मेडिकल बोर्ड बनाने की मांग की थी. हाई कोर्ट से राहत नहीं मिलने पर परिवार Supreme Court पहुंचा, जहां मेडिकल रिपोर्ट और हालत को देखते हुए इलाज हटाने की अनुमति दी गई.
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एएमटी/एबीएम