हिंदी फिल्मों में ‘अंग्रेजीकरण’ से शेखर सुमन नाराज, बताया- यह कॉलोनियल हैंगओवर है

Mumbai , 28 अप्रैल . Actor शेखर सुमन इस समय अभिनय से हटकर फिल्म एकेडमी एसएसएफ के माध्यम से भविष्य के कलाकारों को तराशने में जुटे हैं. उन्होंने के साथ बातचीत में इंडस्ट्री के बदलते स्वरूप और हिंदी भाषा के प्रति बढ़ती उपेक्षा पर तीखी टिप्पणी की.

Actor ने बातचीत में हिंदी सिनेमा में बढ़ते ‘अंग्रेजीकरण’ और ‘औपनिवेशिक मानसिकता’ पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा, “हिंदी फिल्मों में काम करने वाले कलाकारों को जब पुरस्कार मिलते हैं, तो वे अपनी जीत का भाषण अंग्रेजी में देते हैं. क्या कभी हॉलीवुड में किसी भी Actor को अवॉर्ड लेने के बाद हिंदी में भाषण देते देखा है. यह एक कॉलोनियल हैंगओवर है.”

Actor ने कहा कि अंग्रेज चले गए, लेकिन हम आज भी मानसिक रूप से गुलाम हैं. पहले तो बंदूक की नोक पर गुलाम थे, लेकिन आज के समय बिना किसी दबाव के हम मानसिक रूप से ‘गरीब’ हो चुके हैं. हमें अपनी जड़ों पर गर्व करना चाहिए.

Actor ने फिल्मों के शीर्षकों में ‘ए’ अक्षर के अतिरिक्त उपयोग पर आपत्ति जताई. उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति के महाकाव्यों के नामों के साथ छेड़छाड़ क्यों की जा रही है?

उन्होंने कहा, “लोग ‘राम’ को ‘रामा’ और ‘महाभारत’ को ‘महाभारता’ क्यों कहते हैं? यह शब्द तो अंग्रेजी हैं, लेकिन फिल्म तो हिंदी में बन रही है. हिंदी फिल्मों के शीर्षक में ‘रामायणा’ से ‘ए’ हटाया जाना चाहिए और इसकी मूल गरिमा के साथ-साथ ‘रामायण’ ही पुकारा जाना चाहिए.”

उन्होंने कहा, “जब मुझे रोमन लिपि में हिंदी की स्क्रिप्ट दी जाती है, तो मैं बहुत गुस्सा करता हूं. मैं तो पूरी इंडस्ट्री से कहता हूं कि देवनागरी लिपि में स्क्रिप्ट लाओ. हिंदी के कई शब्द और भाव ऐसे होते हैं, जिनका अर्थ अंग्रेजी अक्षरों में लिखने पर पूरी तरह बदल जाता है. यदि हिंदी है, तो उसे देवनागरी में ही होना चाहिए. आज के बच्चों को हिंदी का बुनियादी ज्ञान तक नहीं है. इसमें बच्चों के माता-पिता को बहुत ध्यान देना चाहिए. फ्रांस में लोग फ्रेंच बोलते हैं, जापान और चीन में लोग अपनी भाषा को प्राथमिकता देते हैं. वहां अगर कोई अंग्रेजी बोले तो लोग उसे घूरकर देखते हैं. सिर्फ हम ही हैं जो अपने ही देश में अपनी भाषा बोलने से कतराते हैं.”

एनएस/एबीएम

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