
Mumbai , 20 मई . हिंदी साहित्य और व्यंग्य लेखन की दुनिया में शरद जोशी एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने अपनी प्रभावशाली लेखनी से समाज, राजनीति और व्यवस्था पर गहरी चोट की. Governmentी नौकरी की सुरक्षित जिंदगी छोड़कर उन्होंने साहित्य सृजन को अपना जीवन बना लिया. शरद जोशी मानते थे कि “लिखना जिंदगी जी लेने की एक तरकीब है” और इसी सोच के साथ उन्होंने जीवनभर लेखन किया.
शरद जोशी ने अपने करियर की शुरुआत Madhya Pradesh Government के सूचना एवं प्रकाशन विभाग में नौकरी से की थी. यह एक अच्छी और स्थिर Governmentी नौकरी थी, लेकिन उनके भीतर का लेखक उन्हें लगातार साहित्य की ओर खींचता रहा. आखिरकार उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पूर्णकालिक लेखक बनने का फैसला किया. यह निर्णय आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने साहित्य और लेखन को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया.
उनकी लेखनी का दायरा बेहद व्यापक था. उन्होंने कादम्बरी और ज्ञानोदय समेत कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख और व्यंग्य लिखे. अपने व्यंग्य लेखन के साथ वह समाज की विसंगतियों, भ्रष्टाचार और Political व्यवस्था पर करारा चोट करते थे, लेकिन उसमें मनोरंजन का पुट भी होता था. यही वजह थी कि उनके व्यंग्य पाठकों को हंसाने के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर करते थे.
शरद जोशी का जन्म 21 मई 1931 को हुआ था. उनकी पढ़ाई Madhya Pradesh के उज्जैन और रतलाम में हुई, जबकि स्नातक उन्होंने इंदौर से पूरी की. कॉलेज के दिनों से ही उन्हें लेखन में रुचि थी. हालांकि, परिवार चाहता था कि वह एक सामान्य Governmentी नौकरी करें, लेकिन शरद जोशी का मन साहित्य में बसता था. शुरुआती दौर में उन्होंने छद्म नामों से अखबारों और पत्रिकाओं में लिखना शुरू किया. धीरे-धीरे उनकी पहचान बनी और वह हिंदी व्यंग्य साहित्य के बड़े हस्ताक्षर बन गए.
शरद जोशी का मानना था कि लेखक होना किसी बड़े अफसर बनने से अधिक महत्वपूर्ण है. वे कहा करते थे कि लेखक कभी रिटायर नहीं होता और मरने के बाद भी उसकी रचनाएं उसे जीवित रखती हैं. यही सोच उनके जीवन और लेखन में साफ दिखाई देती है. वह यह भी मानते थे कि इतना लिख लेने के बाद अपने लिखे को देख मैं सिर्फ यही कह पाता हूं कि चलो, इतने वर्षों जी लिया. जीवन जीने का यह मुझे एक बढ़िया बहाना मिल गया.
शरद जोशी ने केवल साहित्य तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि फिल्मों और टेलीविजन के लिए भी यादगार लेखन किया. उन्होंने ‘दिल है कि मानता नहीं’ फिल्म के संवाद लिखे, जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया. इसके अलावा ‘क्षितिज’, ‘उड़ान’, ‘गोधूलि’, ‘सांच को आंच नहीं’, ‘उत्सव’ और ‘चोरनी’ जैसे टीवी शोज व कई फिल्मों में भी उनका लेखन देखने को मिला. उनके चर्चित व्यंग्य नाटकों में ‘अंधों का हाथी’ और ‘एक था गधा उर्फ अलादाद खां’ विशेष रूप से लोकप्रिय रहे. वहीं ‘जीप पर सवार इल्लियां’, ‘हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे’, ‘यत्र-तत्र-सर्वत्र’, ‘राग Bhopal ी’, ‘परिक्रमा’ और ‘नदी में खड़ा कवि’ जैसी रचनाओं ने उन्हें साहित्य जगत में अलग पहचान दिलाई.
हिंदी व्यंग्य साहित्य को नई ऊंचाई देने वाले शरद जोशी का 5 सितंबर 1991 को Mumbai में निधन हो गया.
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एमटी/एबीएम