
New Delhi, 13 फरवरी . केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने Friday को राज्यसभा में सांसदों के सवालों के जवाबों में साफ कर दिया कि Prime Minister मोदी की Government सत्ता सुख के लिए नहीं, बल्कि किसान, गांव और गरीब के सर्वांगीण विकास के लिए है. उन्होंने जोर देकर कहा कि किसान केवल अन्नदाता नहीं, जीवनदाता है– भगवान तो नहीं, पर भगवान से कम भी नहीं – और इसी सोच के साथ एआईएफ से लेकर एमएसपी, दलहन आत्मनिर्भरता मिशन, पीएम-कुसुम, पराली प्रबंधन और फसल विविधीकरण जैसी नीतियां जमीन पर बदलाव ला रही हैं.
Union Minister शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता सत्ता के स्वर्ण सिंहासन पर आरूढ़ होकर सत्ता सुख के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण, किसानों के कल्याण, दरिद्र नारायण की सेवा और आत्मनिर्भर–विकसित India के निर्माण के लिए राजनीति करते हैं. उन्होंने किसान को जीवनदाता बताते हुए कहा कि वह भगवान से कम नहीं है, लेकिन 50 साल तक कांग्रेस की Governmentों ने उसकी मूल समस्याओं की ओर गंभीर ध्यान नहीं दिया, फल–सब्जियां और अनाज पैदा होते रहे पर उन्हें सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त व्यवस्था तक नहीं बनी. Prime Minister मोदी ने किसानों की इन समस्याओं को पहचाना और यही अंतर आज गांव–गांव दिख रहा है.
उन्होंने कहा कि Prime Minister मोदी ने एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड (एआईएफ) के तहत 1 लाख करोड़ रुपए से अधिक की संरचनाएं बनाने का ऐतिहासिक फैसला किया, ताकि किसानों के उत्पाद को सुरक्षित रखा जा सके. इस योजना के अंतर्गत 44,243 कस्टम हायरिंग सेंटर, 25,854 प्राइमरी प्रोसेसिंग सेंटर, 25,565 फार्म हार्वेस्ट ऑटोमेशन यूनिट, 17,779 वेयरहाउस, 4,201 सॉर्टिंग और ग्रेडिंग यूनिट, स्मार्ट और प्रिसीजन एग्रीकल्चर के लिए 3,549 इंफ्रास्ट्रक्चर और 2,827 कोल्ड स्टोरेज स्थापित किए जा चुके हैं.
इन आधुनिक संरचनाओं के कारण फसल, फल और सब्जियों के नुकसान में 5 से 15 प्रतिशत तक कमी आई है, और किसान अब अपना उत्पाद सुरक्षित रखकर बेहतर दाम हासिल कर पा रहे हैं. एआईएफ के तहत एफपीओ और पीएसीएस को भी वेयरहाउस, कोल्ड स्टोरेज और कस्टम हायरिंग सेंटर जैसी सुविधाएं विकसित करने का बड़ा अवसर दिया गया है, जिससे किसानों की आय बढ़ाने की सामूहिक कोशिश को मजबूती मिल रही है.
शिवराज सिंह चौहान ने स्पष्ट कहा कि हम सब India मां के लाल हैं, भेदभाव का सवाल ही नहीं उठता और पंजाब की महान जनता को प्रणाम करते हुए आश्वस्त किया कि मोदी Government पंजाब की प्रगति और विकास में कोई कोर–कसर नहीं छोड़ेगी. उन्होंने बताया कि पंजाब में एआईएफ के तहत 32,014 आवेदन आए और प्रारंभिक लक्ष्य 7,425.98 करोड़ रुपए के मुकाबले 11,351.54 करोड़ रुपए की परियोजनाएं स्वीकृत की गईं, जिनसे बेहतर स्टोरेज, प्रोसेसिंग और मशीनीकरण से 5 से 15 प्रतिशत तक नुकसान में कमी आई और एक–एक परियोजना से 4 से 9 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिला, जिससे लाखों रोजगार पैदा हुए.
तमिलनाडु के संदर्भ में उन्होंने कहा कि ‘दलहन आत्मनिर्भरता मिशन’ समान रूप से पूरे देश में लागू है, अच्छे बीज, क्लस्टर आधारित उत्पादन, डेमोंस्ट्रेशन प्लॉट, प्रति हेक्टेयर 10,000 रुपए तक सहायता, खरीदी और दाल मिलों के लिए सहायता जैसे हर घटक तमिलनाडु में भी मिलेगा, और राज्य Government के साथ मिलकर दाल उत्पादन बढ़ाने को लेकर केंद्र प्रतिबद्ध है.
एमएसपी के मुद्दे पर शिवराज सिंह चौहान ने विपक्ष पर निशाना साधा और कहा कि जब उनकी Government थी, तब स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश – उत्पादन लागत पर 50 प्रतिशत मुनाफा जोड़कर एमएसपी – को उन्होंने कोर्ट में हलफनामा देकर ठुकरा दिया. उन्होंने कहा कि मोदी Government ने 50 प्रतिशत लागत पर मुनाफा जोड़कर एमएसपी घोषित करने का काम किया है, और इस अंतर को किसानों ने जमीनी स्तर पर महसूस किया है.
दलहन खरीद के उदाहरण में उन्होंने बताया कि यूपीए Government के 10 साल में मात्र 6 लाख मीट्रिक टन दलहन खरीदा गया, जबकि मोदी Government ने 1 करोड़ 92 लाख मीट्रिक टन दलहन की खरीद की है, यानी नाममात्र की खरीद से कई गुना अधिक खरीद कर दोगुने दाम किसानों तक पहुंचाए गए. उन्होंने घोषणा की कि तुअर, मसूर और उड़द की 100 प्रतिशत खरीदी सुनिश्चित की जाएगी, किसान जितना उत्पादन करेगा और बेचना चाहेगा, केंद्र Government पूरी मात्रा खरीदेगी. इसके लिए एनएएफईडी और एनसीसीएफ को अधिकृत किया गया है, साथ ही राज्य Governmentें भी अपनी एजेंसियों के माध्यम से खरीदी कर सकती हैं, जबकि बाकी दलहनों की खरीद पीएम-आशा के तहत होगी और समयबद्ध भुगतान के लिए डीबीटी के माध्यम से सिंगल क्लिक से पैसे सीधे किसानों के खाते में भेजे जाएंगे.
Union Minister चौहान ने बताया कि दलहन में India का क्षेत्रफल हिस्सा 38 प्रतिशत था, लेकिन उत्पादन 28 प्रतिशत ही, यानी कम उत्पादकता, पुराने बीज, कम बीज रिप्लेसमेंट और मौसम की मार की वजह से कई राज्यों में किसानों ने दलहन की खेती छोड़कर अन्य फसलें अपनानी शुरू कर दीं. 2016 तक India दालों का सबसे बड़ा आयातक था, लेकिन टेक्नोलॉजी, उन्नत किस्में, वैज्ञानिक शोध, किसानों को सुविधाएँ और नीति समर्थन के जरिए ‘दलहन क्रांति’ का प्रारंभ हुआ, जिससे 2021-22 में 27.30 मिलियन टन का अब तक का सबसे अधिक उत्पादन दर्ज हुआ.
उन्होंने कहा कि ‘दलहन आत्मनिर्भरता मिशन’ के तहत अच्छी किस्मों के बीजों का विकास, बीज रिप्लेसमेंट दर बढ़ाना, किसानों को ट्रेनिंग, क्लस्टर अप्रोच, मुफ्त मिनी किट, प्रदर्शन प्लॉट, प्रति हेक्टेयर ₹10,000 तक अनुदान, पारदर्शी खरीद और प्रोसेसिंग के लिए दाल मिल खोलने पर 25 लाख रुपए तक सहायता जैसे प्रावधान किए गए हैं.
Madhya Pradesh की बात करते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस Government के समय जहां केवल एक फसल होती थी, वहीं अब तीन–तीन फसलें, जिनमें मूंग भी शामिल है, उग रही हैं और सिंचाई व नीतिगत समर्थन के कारण गर्मी के मौसम में 20 लाख मीट्रिक टन तक मूंग उत्पादन हो रहा है, जिसके लिए पारदर्शी खरीदी और ‘भावांतर भुगतान’ जैसी योजनाएं लागू हैं. उनका विश्वास है कि इस मिशन के माध्यम से India 2030-31 तक दालों में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाएगा.
शिवराज सिंह चौहान ने साफ कहा कि दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का कारण केवल पराली और किसान नहीं हैं. वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि शीतकाल में भी पराली का योगदान 5 प्रतिशत से अधिक नहीं है, जबकि बड़ा हिस्सा औद्योगिक इकाइयों और वाहनों से निकलने वाले धुएं का है. ऐसे में हर बार केवल किसान को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है. उन्होंने माना कि पराली जलाने से मित्र कीट, न्यूट्रिएंट्स, ऑर्गेनिक कार्बन नष्ट होते हैं, मिट्टी की उर्वरता घटती है और प्रदूषण भी बढ़ता है, इसलिए Government ने फसल अवशेष प्रबंधन (सीआरएम) योजना के तहत किसानों को पराली प्रबंधन मशीनों पर 50 प्रतिशत सब्सिडी और एफपीओ/संस्थाओं को कस्टम हायरिंग सेंटर खोलने पर 80 प्रतिशत सब्सिडी दी है.
उन्होंने बताया कि पंजाब, Haryana, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और Madhya Pradesh में अब तक 3.5 लाख से अधिक मशीनें वितरित की गई हैं – पंजाब में 1,60,296, Haryana में 1,10,550 और उत्तर प्रदेश में 76,135 – जिसके चलते पराली जलाने की घटनाएं लगातार घटी हैं और पंजाब में पिछली बार यह घटनाएं लगभग 5,000 तक सीमित रहीं. उत्तर प्रदेश में घटनाओं में 17 प्रतिशत कमी दर्ज की गई, भले ही एक बार भारी बारिश के बाद एक साथ कटाई और नमी के चलते कुछ किसानों ने पराली जलाई हो. वहीं, मेरठ, शामली, हापुड़, मुजफ्फरनगर, बुलंदशहर, गाजियाबाद, बागपत और गौतमबुद्ध नगर में 11 पैलेटिंग विनिर्माण संयंत्र तथा 32.63 हजार टन भंडारण क्षमता विकसित कर पराली को संसाधन में बदला जा रहा है.
Haryana मॉडल की सराहना करते हुए उन्होंने बताया कि राज्य Government इन-सीटू और एक्स-सीटू प्रबंधन के लिए प्रति एकड़ 1,000 रुपए, ‘मेरा पानी–मेरी विरासत’ के तहत धान के स्थान पर अन्य फसलों के लिए प्रति एकड़ 7,000 रुपए, डीएसआर के लिए प्रति एकड़ 4,000 रुपए, पराली न जलाने पर रेड जोन पंचायतों को 1,00,000 रुपए, येलो जोन पंचायतों को 50,000 रुपए और गौशालाओं तक पराली पहुंचाने के लिए प्रति ट्रांसपोर्ट 500 रुपए (अधिकतम 15,000 रुपए) तक सहायता दे रही है.
उन्होंने धान की पराली को कीमती संसाधन बताते हुए कहा कि एक्स-सीटू मैनेजमेंट के तहत क्लस्टर आधारित सप्लाई चेन, बंडलिंग और ट्रांसपोर्ट से इसे पैलेटिंग, थर्मल पावर प्लांट, बायोमास इंडस्ट्री, बायो-सीएमजी और फ्यूल जैसी इंडस्ट्री के लिए फीडस्टॉक बनाया जा रहा है.
शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि Government का पहला लक्ष्य गेहूं और चावल में आत्मनिर्भरता था, जिसे हासिल कर आज India चावल और गेहूं दोनों का निर्यात कर रहा है और चावल के उत्पादन में 15 करोड़ टन के साथ चीन को पीछे छोड़कर विश्व में नंबर एक हो चुका है. उन्होंने माना कि चावल में पानी की खपत बहुत अधिक है, इसलिए कम समय और कम पानी वाली किस्मों का विकास और डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसमें खेत में स्थायी रूप से पानी भरने की आवश्यकता नहीं रहती.
इसके समानांतर, पंजाब, Haryana और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फसल विविधीकरण कार्यक्रम के तहत दलहन, तिलहन, मोटे एवं पोषक अनाज, मक्का, जौं, कपास और कृषिवानिकी जैसी वैकल्पिक फसलों को प्रोत्साहित किया जा रहा है, और राज्य Governmentों के माध्यम से दलहन के लिए 9,000 रुपए प्रति हेक्टेयर, मक्का व जौं के लिए 7,500 रुपए, हाइब्रिड मक्का के लिए 11,500 रुपए और पोषक अनाजों के लिए 7,500 रुपए प्रति हेक्टेयर तक सहायता दी जा रही है.
उन्होंने कहा कि दलहन की सुनिश्चित खरीद, इंपोर्ट ड्यूटी के जरिये सस्ते आयात पर नियंत्रण और किसानों को उचित दाम दिलाने के लगातार प्रयासों के साथ–साथ एआईएफ, पीएम-कुसुम और ग्रामीण विकास के मोर्चे पर चल रहे कदम मिलकर किसान को केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि ऊर्जादाता और आत्मनिर्भर India के वास्तविक निर्माता के रूप में स्थापित कर रहे हैं.
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डीकेपी/