
Patna, 25 जुलाई . केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद बिहार की राजनीति में बयानबाजी तेज हो गई है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने इस घटनाक्रम को लेकर एक-दूसरे से बिल्कुल अलग Political संदेश देने की कोशिश की है.
बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने social media प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा कि धर्मेंद्र प्रधान का शिक्षा मंत्री के रूप में कार्यकाल केवल एक प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं था, बल्कि शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र निर्माण के उनके दीर्घकालिक दृष्टिकोण का विस्तार था. उन्होंने कहा कि छात्र आंदोलनों से जुड़ी उनकी पृष्ठभूमि ने उन्हें युवाओं की आकांक्षाओं, चुनौतियों और सपनों को समझने का अवसर दिया, और यही अनुभव उनके सार्वजनिक जीवन की सबसे बड़ी ताकत रहा.
सरावगी ने कहा कि शिक्षा मंत्री के पद से विदा लेते समय पूरा देश उनके योगदान, समर्पण और सेवाओं के लिए उनका आभार व्यक्त करता है. उन्होंने धर्मेंद्र प्रधान के शिक्षा क्षेत्र में योगदान और विद्यार्थियों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता की सराहना करते हुए उनके आगामी सार्वजनिक जीवन के लिए शुभकामनाएं भी दीं.
वहीं, राजद ने इस इस्तीफे को छात्र-युवा आंदोलन और लोकतंत्र की जीत करार दिया. राजद प्रवक्ता शक्ति सिंह यादव ने कहा कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा युवाओं और छात्रों के लंबे संघर्ष का परिणाम है. उन्होंने कहा कि छात्रों ने धैर्य, निष्ठा और साहस का परिचय दिया, लाठीचार्ज और दमन का सामना किया, लेकिन अपने आंदोलन से पीछे नहीं हटे.
उनके मुताबिक, यह लोकतंत्र की ताकत की जीत है और सत्ता को जनता के दबाव के आगे झुकना पड़ा है. उन्होंने कहा कि आंदोलन के दौरान जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों को Government को मुआवजा देना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि निष्पक्ष परीक्षाओं और शिक्षा व्यवस्था में सुधार को लेकर अभी कई सवाल बाकी हैं, जिन पर Government को जवाब देना होगा.
राजद के एक अन्य प्रवक्ता चित्तरंजन गगन ने भी धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को छात्र-युवा शक्ति की जीत बताया. उन्होंने कहा कि यह इस्तीफा नैतिक आधार पर नहीं, बल्कि छात्रों के देशव्यापी विरोध प्रदर्शन और बढ़ते जनदबाव के कारण मजबूरी में दिया गया है. गगन ने आरोप लगाया कि Government छात्रों के आंदोलन और जनता की नाराजगी से घबरा गई, जिसके बाद यह फैसला लिया गया. उन्होंने कहा कि इस घटनाक्रम से यह स्पष्ट हो गया है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज सबसे बड़ी ताकत होती है.
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एमएनपी/डीकेपी