
New Delhi, 14 अगस्त . देश में आयोजित हुई जी20 समिट के दौरान India की ओर से प्रस्तावित किए गए इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (आईएमईसी) मौजूदा समय की जरूरत है और यह मध्य पूर्व तनाव में बाधित हुए हॉर्मुज स्ट्रेट ने साबित कर दिया है. यह जानकारी एक रिपोर्ट में दी गई.
आईएमईसी को चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का भारतीय जवाब माना जा रहा है.
ज्यूइश टेलीग्राफिक एजेंसी द्वारा प्रकाशित एक आर्टिकल के अनुसार, इसकी परिकल्पना बंदरगाहों, रेलवे, एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर, फाइबर-ऑप्टिक केबल और लॉजिस्टिक्स लिंक के एक ऐसे नेटवर्क के तौर पर की गई है जो खाड़ी और इजरायल के जरिए India को यूरोप से जोड़ेगा. इसके तहत सामान India से अरब प्रायद्वीप होते हुए, सऊदी अरब और जॉर्डन से गुजरकर इजरायल और फिर हाइफा के रास्ते यूरोप तक पहुंचता है. इस रास्ते से समुद्री जहाजों के लिए खतरनाक संकरे रास्तों और इराक, सीरिया व लेबनान जैसे अस्थिर देशों से होकर नहीं गुजरना पड़ता.
आर्टिकल में आगे कहा गया है कि भले ही मध्य पूर्व के तनाव की वजह से आईएमईसी प्रोजेक्ट फिलहाल ठंडे बस्ते में चला गया है, लेकिन पर्शियन गल्फ और रेड सी में समुद्री व्यापार में आई रुकावटों ने सभी पक्षों के लिए इसकी जरूरत को और बढ़ा दिया है.
अगर इजरायल को केंद्र में रखकर आईएमईसी सफल होता है, तो देश का हाइफा पोर्ट पूर्वी मेडिटेरेनियन का मुख्य लॉजिस्टिक्स हब बन सकता है. साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी, सेमीकंडक्टर, डिसेलिनेशन और एनर्जी टेक्नोलॉजी में इजरायल की खूबियां Bengaluru से बर्लिन तक फैली सप्लाई चेन का हिस्सा बन जाएंगी.
आर्टिकिल में हाल की उन स्टडीज का भी जिक्र है जिनसे पता चलता है कि अगर यह कॉरिडोर पूरा हो जाता है, तो India और यूरोप के बीच ट्रांसपोर्ट का समय 40 प्रतिशत तक कम हो सकता है और लॉजिस्टिक्स की लागत में लगभग 30 प्रतिशत की कमी आ सकती है. इससे एक स्टैंडर्ड कंटेनर की शिपिंग लागत लगभग 6,000 डॉलर से घटकर 4,200 डॉलर के आसपास रह जाएगी.
आर्टिकिल में यह भी कहा गया है कि इससे न सिर्फ नए बिजनेस के फलने-फूलने के लिए एक इकोसिस्टम बनेगा, बल्कि हर साल 1.5 मिलियन कंटेनर के मामूली वॉल्यूम पर भी सिर्फ ढुलाई लागत में लगभग 2.7 अरब डॉलर की बचत होगी.
–
एबीएस