‘बिस्पोकन’ पुस्तक का लोकार्पण, लेखक की नजर से समझें ‘एंड्रयू रामरूप’ की कहानी तक पहुंचने का सफर

New Delhi, 22 अगस्त . राष्ट्रीय राजधानी New Delhi के इंडिया हैबिटैट सेंटर स्थित सिल्वर ओक हॉल एंड पैटियो में Saturday को ‘बिस्पोकन’ पुस्तक के लोकार्पण समारोह का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने शिरकत की. कार्यक्रम की अध्यक्षता फैशन डिजाइन काउंसिल ऑफ इंडिया (एफडीसीआई) के चेयरमैन सुनील सेठी ने की.

कार्यक्रम में लेखक अशोक कुमार बाल ने किताब के पीछे की प्रेरणा और इसके केंद्र में मौजूद असाधारण व्यक्तित्व एंड्रयू एम रामरूप की कहानी से जुड़ी अपनी यात्रा साझा की.

लेखक ने को बताया कि इस किताब को लिखने का विचार किसी लंबे शोध या पहले से तय योजना से नहीं, बल्कि एक बेहद साधारण घटना से पैदा हुआ.

उन्होंने बताया कि एक दिन वह अपने बेटे के साथ Mumbai के काला घोड़ा इलाके में एक टेलरिंग की दुकान पर गए थे. कपड़े की नाप लेने के बाद दुकान के युवा मालिक मोहित बेलानी से बातचीत शुरू हुई. इसी दौरान उनकी नजर दीवार पर लगे एक फ्रेम किए हुए प्रमाणपत्र पर पड़ी. उस प्रमाणपत्र पर ‘सैविले रो बिस्पोक एकेडमी’ लिखा था और उसके नीचे एंड्रयू एम रामरूप के हस्ताक्षर थे. यही नाम आगे की पूरी कहानी की शुरुआत बन गया.

अशोक कुमार बाल ने बताया कि उन्होंने जब प्रमाण पत्र के बारे में मोहित बेलानी से पूछा तो बातचीत धीरे-धीरे एंड्रयू एम रामरूप की ओर पहुंच गई. मोहित लगातार एंड्रयू के बारे में बताते रहे. इस दौरान मोहित ने उन्हें बताया कि एंड्रयू एक लीजेंड हैं और असाधारण कौशल रखने वाले कारीगर हैं.

लेखक ने आगे कहा कि उस बातचीत ने उनके मन पर एंड्रयू की गहरी छाप छोड़ी. वह उस नाम को अपने साथ घर लेकर लौटे. इसके बाद उन्होंने इंटरनेट पर एंड्रयू के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की और गूगल के जरिए रिसर्च की. रिसर्च के दौरान एंड्रयू के जीवन, काम और उपलब्धियों से जुड़ी इतनी जानकारियां मिली कि उन्हें लगा कि उनकी कहानी किसी आधुनिक महाकाव्य से कम नहीं है.

अशोक कुमार बाल ने कहा कि उन्हें एंड्रयू केवल एक बेहतरीन कारीगर के रूप में नहीं, बल्कि इनोवेशन, आर्ट, शिल्पकारिता और ज्ञान के असाधारण स्रोत के तौर पर नजर आए. यहीं से उन्होंने तय किया कि एंड्रयू की कहानी को सिर्फ एक व्यक्ति की जीवनी के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी किताब के रूप में सामने लाया जाना चाहिए.

लेखक ने बताया कि इस पुस्तक को लिखने की प्रक्रिया में मैंने उनके साथ कई ईमेल का आदान-प्रदान किया. शुरुआत में वे थोड़े हिचकिचा रहे थे. जब मैंने उनसे कहा कि मेरा पहला अध्याय आपकी ‘भारतीय पैतृक जड़ों’ के बारे में होगा, तो वे बहुत भावुक हो गए. उन्होंने सोचा कि लिखने का यही सही तरीका है, क्योंकि कई लोग उनके रूप-रंग को देखकर अफ्रीकी समझ लेते हैं और उनकी भारतीय जड़ों के बारे में नहीं जानते.

लेखक ने आगे कहा कि इसलिए जब मैंने प्रस्ताव दिया कि पहला अध्याय उनकी भारतीय वंशावली और भारतीय जड़ों पर केंद्रित होगा, तो वे बहुत उत्साहित हुए और उन पर किताब लिखने के प्रस्ताव से सहमत हो गए.

पीएसके/एबीएम

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