13 दिनों में शेख शाहजहां तृणमूल के लिए कैसे बन गए बोझ

कोलकाता, 3 मार्च . पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के 15 फरवरी को विधानसभा में दिए भाषण ने राज्य के लोगों को एक तरह से आश्वस्त कर दिया था वह और उनकी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, तत्कालीन भगोड़े नेता शेख शाहजहां के पीछे पूरी ताकत झोंक देगी.

उस दिन, सदन के पटल पर मुख्यमंत्री ने वहां चल रहे तनाव के लिए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को जिम्मेदार ठहराया, जिसके अधिकारियों को सीएपीएफ कर्मियों के साथ पांच जनवरी को संदेशखाली में पीटा गया था. उन्होंने यह भी कहा था कि ईडी शाहजहां को निशाना बनाकर और गड़बड़ी पैदा करने के इरादे से संदेशखाली गई थी.

उस भाषण से ऐसा लग रहा था कि वह शाहजहां के साथ एकजुटता का संदेश देने और उसे “परिस्थितियों का शिकार” बताने की कोशिश कर रहीं थीं.

पार्टी महासचिव और लोकसभा सदस्य अभिषेक बनर्जी ने भी इसी तरह की बात कही. उन्होंने ईडी पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि उनकी जानकारी के मुताबिक जब हमला हुआ, तो शाहजहां वहां नहीं थे.

दोनों के इस मुद्दे पर बोलने के बाद पार्टी के अन्य नेताओं ने भी शाहजहां के समर्थन में बयान जारी करना शुरू कर दियाा.

लेकिन 28 फरवरी को मुख्यमंत्री के स्वर में काफी बदलाव आ गया, जब उन्होंने प्रशासनिक समीक्षा बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि उन्होंने कभी भी अन्याय का पोषण या समर्थन नहीं किया. मुख्यमंत्री ने कहा,“मैं कहीं भी जुल्म या खून-खराबा नहीं चाहती. मैं अन्याय नहीं करती और अगर मेरी जानकारी के बिना कुछ होता है, तो मैं उसका समर्थन भी नहीं करती.”

ईडी और सीएपीएफ कर्मियों पर हमले के 55 दिन बाद, 28 फरवरी की रात पुलिस ने शाहजहां को संदेशखाली के निकट मिनाखान में एक अज्ञात स्थान से गिरफ्तार कर लिया.

सूत्रों ने कहा, “संभवतया, प्रशासनिक समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री का बदला हुआ स्वर इस बात का संकेत था कि अब सरकार शाहजहां का समर्थन नहींं करेगी.”

अब सवाल यह उठता है कि मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी के नेतृत्व को शाहजहां पर रुख बदलने में 13 दिन क्यों लग गए और वह अचानक “संपत्ति” से “देनदारी” में कैसे बदल गए.

ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से सरकार के रुख में इतना तेज बदलाव आया. 15 फरवरी को जब मुख्यमंत्री ने सदन में शाहजहां का बचाव किया, तो संभवतः उनकी पार्टी और सरकार का दृढ़ विश्वास था कि तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ संदेशखाली में स्थानीय महिलाओं द्वारा किया गया विरोध प्रदर्शन एक अस्थायी घटना है और इसके पीछे विपक्ष का हाथ होने की बात कहकर इसेे खारिज किया जा सकता है.

लेकिन संभवतः सत्तारूढ़ दल और राज्य सरकार स्थानीय महिलाओं के आंदोलन की नब्ज को समझने में असफल रहा, जो वर्षों के उत्पीड़न, हिंसा और यहां तक कि यौन उत्पीड़न के खिलाफ गुस्से का एक सहज विस्फोट था. आंदोलन के तेज होने और सत्तारूढ़ दल व राज्य सरकार की कुछ रणनीतिक गलतियाें की वजह से संदेशखाली पूरे देश की नजर में आ गया.

पहली गलती विपक्षी दलों के नेताओं, केंद्रीय आयोगों और केंद्रीय तथ्यान्वेषी टीमों को संदेशखाली पहुंचने से रोकना था, जबकि राज्य के मंत्रियों और सत्तारूढ़ दल के नेताओं को वहां जाने की अनुमति दी गई.

दूसरी गलती संदेशखाली से रिपोर्टिंग कर रहे एक बंगाली टेलीविजन चैनल के पत्रकार की गिरफ्तारी थी, जिसे कलकत्ता उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया.

इन घटनाक्रमों ने राष्ट्रीय और कुछ हद तक अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान संदेशखाली पर केंद्रित कर दिया. संदेशखाली की महिलाओं के आंदोलन की तुलना 2007 और 2009 के बीच पूर्वी मिदनापुर जिले के नंदीग्राम और हुगली जिले के सिंगूर में खेत मालिकों के आंदोलन से की जाने लगी.

उस वक्त मुख्यमंत्री ने यह संदेश देने की कोशिश भी की कि संदेशखाली के घटनाक्रम की तुलना सिंगुर और नंदीग्राम से नहीं की जा सकती.

मुख्यमंत्री ने कहा, ”एक दूसरे से तुलना करके दंगा कराने का प्रयास किया जा रहा है.”

तीसरी और अंतिम गलती शाहजहां को गिरफ्तार करने में राज्य पुलिस के लिए बाधाएं पैदा करने के लिए कलकत्ता उच्च न्यायालय को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश थी. सरकार के एक वर्ग ने यह दावा करना शुरू कर दिया कि कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा रोक लगाए जाने के कारण राज्य पुलिस शेख शाहजहां को गिरफ्तार नही कर पा रही.

हालांकि, 28 फरवरी की सुबह कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश टी.एस. शिवगणम ने कहा कि शाहजहां की गिरफ्तारी पर रोक नहीं है और कोई भी एजेंसी उसे गिरफ्तार कर सकती है.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नजर में मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी सरकार के लिए आंखें खोलने वाली थी और यह एहसास भी था कि शाहजहां को बचाने का अब कोई भी प्रयास राजनीतिक रूप से उसके लिए बहुत नुकसानदेह हो सकता है. 28 फरवरी की दोपहर मुख्यमंत्री के सुर बदलते ही उसी रात पुलिस ने शाहजहां को 55 दिनों तक फरार होने के बाद गिरफ्तार कर लिया.

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