
New Delhi, 24 अप्रैल . कमजोर टैक्स बेस के अलावा वैश्विक और घरेलू कारणों की वजह से बांग्लादेश कर्ज के बोझ तले दबता जा रहा है. हालात इस कदर खराब हो गए हैं कि 2026 से 2030 तक अगले पांच वित्तीय वर्षों में उसे बाहरी ऋण चुकाने के लिए लगभग 26 अरब डॉलर खर्च करने होंगे, जिससे देश पर भारी आर्थिक बोझ पड़ने की आशंका है.
इतना ही नहीं, 2030 तक बांग्लादेश का सालाना कर्ज भुगतान लगभग 5.5 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है.
ढाका ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश पर कर्ज का बोझ “बहुत अधिक” है, क्योंकि पिछले 54 वर्षों में देश ने बाहरी ऋण चुकाने पर कुल लगभग 40 अरब डॉलर खर्च किए हैं. इस राशि के दो-तिहाई हिस्से के बराबर भुगतान तो अगले पांच वर्षों में ही करना होगा. जून तक बांग्लादेश का कुल बाहरी कर्ज लगभग 77 अरब डॉलर था, जो राष्ट्रीय आय का करीब 19 प्रतिशत है और यह अनुपात लगातार बढ़ रहा है.
वर्तमान में देश की ऋण-सेवा और Governmentी राजस्व का अनुपात 16.5 प्रतिशत है, जो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के 18 प्रतिशत के जोखिम स्तर से थोड़ा कम है, लेकिन स्थिति फिर भी चिंताजनक बताई गई है.
लेख में यह भी कहा गया है कि 2026 से 2035 के बीच 10 वित्तीय वर्षों में बांग्लादेश को कुल 51 अरब डॉलर का बाहरी कर्ज चुकाना होगा, जो अगले पांच वर्षों की तुलना में दोगुना है.
2021 से 2025 के बीच बांग्लादेश को हर महीने लगभग 2 अरब डॉलर रेमिटेंस प्राप्त हुआ था. इस आधार पर सबसे अधिक वार्षिक कर्ज भुगतान को लगभग तीन महीनों की रेमिटेंस आय से पूरा किया जा सकता है. यदि यही रुझान जारी रहा, तो देश को मौजूदा कर्ज से पूरी तरह मुक्त होने में 37 साल यानी 2063 तक का समय लग सकता है.
कर्ज बढ़ने के कारणों में वैश्विक और घरेलू दोनों कारक शामिल बताए गए हैं. वैश्विक कारणों में यूक्रेन युद्ध, कोविड-19 महामारी और मध्य पूर्व संघर्ष जैसे हालात शामिल हैं, जिनसे निर्यात, विदेशी निवेश और रेमिटेंस प्रभावित हुए हैं.
वहीं घरेलू कारणों में बड़े पैमाने पर विदेशी ऋण से चल रहे बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स शामिल हैं, जैसे रूपपुर न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट (11 अरब डॉलर), कर्णफुली टनल, पद्मा रेल लिंक और शाहजलाल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का तीसरा टर्मिनल. इन परियोजनाओं में देरी से लागत बढ़ी और कर्ज का बोझ और भारी हो गया.
इसके अलावा, टैक्स बेस का पर्याप्त विस्तार न होना और अंतरराष्ट्रीय ऋणदाताओं द्वारा ब्याज दरों, चुकौती अवधि और ग्रेस पीरियड में बदलाव भी देश की कर्ज चुकाने की क्षमता पर दबाव बढ़ा रहे हैं.
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केके/वीसी