
इस्लामाबाद, 30 मई . Pakistan खुद को अंतरराष्ट्रीय मामलों में महत्वपूर्ण मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है, लेकिन एक रिपोर्ट में कश्मीर, कारगिल युद्ध, ओसामा बिन लादेन और परमाणु तकनीक से जुड़े पुराने मामलों का हवाला देते हुए कहा गया है कि Pakistan का पिछला रिकॉर्ड भरोसेमंद नहीं रहा है. ऐसे में अगर वह ईरान, सऊदी अरब और इजरायल जैसे देशों से जुड़े किसी भी कूटनीतिक प्रयास में बड़ी भूमिका निभाना चाहता है, तो उसकी भूमिका को सावधानी और संदेह के साथ देखा जाना चाहिए.
काउंटर प्वाइंट में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, Pakistan खुद को अमेरिका-ईरान वार्ता समेत कई अंतरराष्ट्रीय मामलों में एक “महत्वपूर्ण मध्यस्थ” के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन रिपोर्ट का कहना है कि कूटनीति केवल सुविधा पर नहीं, बल्कि भरोसे और विश्वसनीयता पर आधारित होती है और Pakistan का पिछला रिकॉर्ड इस पर गंभीर सवाल खड़ा करता है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि 1947 में आजादी के बाद से Pakistan कई बार समझौते और वादे करने के बाद उन्हें तोड़ता रहा है, जब वे उसके रणनीतिक या वैचारिक हितों के खिलाफ जाते हैं. 1947 में विभाजन के तुरंत बाद Pakistan ने कश्मीर में कबायली हमलावरों को समर्थन दिया था. इससे हालात बिगड़े और कश्मीर India में शामिल हो गया. इसके बाद भी कश्मीर दोनों देशों के बीच विवाद का विषय बना रहा.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि India और Pakistan ने कई बार शांति समझौते किए, जिनमें शिमला समझौता और लाहौर घोषणा शामिल हैं, लेकिन 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान Pakistan ने नियंत्रण रेखा पार कर दी, जिससे शांति प्रक्रिया को झटका लगा.
रिपोर्ट में 1971 के पूर्वी Pakistan (अब बांग्लादेश) संकट का भी उल्लेख किया गया है. इसमें कहा गया है कि उस समय पश्चिमी Pakistan की सेना पर बड़ी संख्या में बंगाली नागरिकों की हत्या और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के आरोप लगे थे.
रिपोर्ट के अनुसार, 9/11 अटैक के बाद Pakistan को आतंकवाद से लड़ने के लिए अमेरिका से अरबों डॉलर की सहायता मिली थी. इसके बावजूद दुनिया के सबसे वांछित आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को कई वर्षों तक Pakistan के एबटाबाद शहर में शरण मिली हुई थी. 2011 में अमेरिकी कार्रवाई के दौरान वह वहीं पाया गया था.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि Pakistan के भीतर धार्मिक अल्पसंख्यकों, जैसे हिंदुओं, ईसाइयों, अहमदियों और शिया समुदाय के लोगों को भेदभाव और हिंसा का सामना करना पड़ता है.
इसके अलावा रिपोर्ट में कहा गया है कि Pakistan ने अब तक परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. साथ ही उस पर परमाणु तकनीक और संबंधित जानकारी अन्य देशों तक पहुंचाने के आरोप भी लगते रहे हैं.
रिपोर्ट में इस बात पर जोर देते हुए कि Pakistan का पाखंड अपने देश में भी जारी है. कहा गया है कि ईशनिंदा कानून और भीड़ की हिंसा से ईसाई, हिंदू, अहमदिया और शिया समुदाय के लोग डरे हुए हैं. इस्लामाबाद अब दुनिया के सबसे अस्थिर इलाकों में से एक में डिप्लोमेसी को आकार देने में भूमिका चाहता है.
रिपोर्ट में कहा गया, “यह वही देश है जिसने कभी परमाणु हथियारों के अप्रसार पर संधि पर हस्ताक्षर नहीं किया और जिसके नेटवर्क ने ईरान, उत्तर कोरिया और लीबिया को सेंट्रीफ्यूज टेक्नोलॉजी और बम बनाने की जानकारी बेची. अब यह इजरायल से जुड़ी डिप्लोमेसी में प्रभाव डालना चाहता है, एक ऐसा देश जिसे Pakistan मान्यता देने से इनकार करता है और जिसे लंबे समय से नाजायज मानता रहा है.”
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केके/वीसी