
New Delhi, 21 अप्रैल . स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश को इस महीने की शुरुआत में हुए आईएमएफ-वर्ल्ड बैंक स्प्रिंग मीटिंग में अपने अटके हुए आईएमएफ प्रोग्राम पर कोई खास प्रगति नहीं मिली. साथ ही यह भी भरोसा नहीं मिला कि वर्ल्ड बैंक, एडीबी, एआईआईबी और जापान से मिलने वाला 3.2 अरब डॉलर का बजट सपोर्ट Government की तय समयसीमा में मिल पाएगा.
ढाका के बिजनेस स्टैंडर्ड अखबार के एक आर्टिकल के मुताबिक, ऐसे समय में जब होर्मुज स्ट्रेट में तनाव पहले से ही ग्लोबल ऊर्जा और माल ढुलाई के बाजारों को परेशान कर रहा है, यह अनिश्चितता और भी मुश्किल पैदा कर रही है.
फिर भी बांग्लादेश Government का रुख शांत बना हुआ है. अधिकारियों का कहना है कि आईएमएफ प्रोग्राम खत्म नहीं हुआ है और आने वाले महीनों में बातचीत पूरी होते ही बाहरी फंडिंग मिल जाएगी.
इस समय बांग्लादेश की आर्थिक हालत थोड़ी तंग है. Government ने 9.3 ट्रिलियन टका का रिकॉर्ड बजट बनाया है, जो काफी बड़े रेवेन्यू टारगेट पर टिका है. इससे घाटा जीडीपी के मुकाबले कम दिखता है, लेकिन असल में दबाव बना हुआ है. मतलब साफ है, सुधारों को अभी टालने की कोशिश हो रही है, जबकि दुनिया की हालत और मुश्किल होती जा रही है.
मध्य पूर्व के संघर्ष के कारण तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, जिससे आयात बिल और सब्सिडी का खर्च बढ़ रहा है. सऊदी अरब और कतर से यूरिया की सप्लाई में रुकावट से खाद महंगी हो रही है और खेती पर असर पड़ सकता है. खाड़ी क्षेत्र से आने-जाने वाले जहाजों पर युद्ध जोखिम का खर्च बढ़ने से माल ढुलाई भी महंगी हो रही है. इन सबका सीधा असर विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहा है, जो पहले से ही दबाव में है.
सबसे अहम बात यह है कि ये समस्याएं थोड़े समय की नहीं हैं. भले ही हालात जल्दी सामान्य हो जाएं, लेकिन कीमतों, सप्लाई चेन और जोखिम के असर लंबे समय तक बने रह सकते हैं. यानी यह एक ऐसा झटका है जो धीरे-धीरे और ज्यादा असर दिखाएगा. और यह ऐसे समय में आ रहा है जब बांग्लादेश की नीतियों पर भरोसा कमजोर पड़ने लगा है.
असल समस्या यह है कि अब दबाव सिर्फ बाहर से नहीं आ रहा. एक तरफ वैश्विक हालात खराब हो रहे हैं, दूसरी तरफ देश के अंदर नीतियों में धीमापन है. दोनों तरफ से दबाव बढ़ रहा है और Government के पास विकल्प कम होते जा रहे हैं.
ऐसी स्थिति में आईएमएफ प्रोग्राम का अटका होना सिर्फ पैसों का मामला नहीं है. अगर आईएमएफ का प्रोग्राम चालू नहीं रहता, तो बांग्लादेश की विश्वसनीयता भी कम हो जाती है. इससे दूसरे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से कर्ज लेना और मुश्किल हो सकता है.
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एवाई/डीकेपी