विवादास्पद नेता की आयकर शिकायतों में नेहरू के हस्तक्षेप संबंधी पत्राचार खड़े करते हैं कई असहज सवाल

New Delhi, 22 जून . स्वतंत्र India के प्रथम Prime Minister जवाहरलाल नेहरू द्वारा तत्कालीन वित्त मंत्री जॉन मथाई और पश्चिम बंगाल के Chief Minister बिधान चंद्र रॉय को लिखे गए निजी पत्र एक ऐसे प्रसंग का खुलासा करते हैं, जो दर्शाता है कि उस समय कुछ मुद्दों को उनके ऐतिहासिक महत्व और संवेदनशीलता की तुलना में जनधारणा तथा Political प्रभावों के संदर्भ में अधिक देखा और संबोधित किया जा रहा था.

डिजिटाइज्ड नेहरू अभिलेखागार में उपलब्ध यह पत्राचार दर्शाता है कि जवाहरलाल नेहरू को हुसैन शहीद सुहरावर्दी के कथित आयकर विवादों को लेकर गहरी चिंता थी जबकि नेहरू India के विभाजन के समय हुए ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स में उनकी भूमिका से भी परिचित थे.

हालांकि, इन पत्रों में उस भीषण नरसंहार का विस्तृत उल्लेख नहीं मिलता, जिसमें सांप्रदायिक हिंसा के दौरान हजारों लोगों की हत्या कर दी गई थी. अविभाजित बंगाल के अंतिम Prime Minister के रूप में याद किए जाने वाले सुहरावर्दी पर 1946 के “डायरेक्ट एक्शन डे” दंगों के दौरान सांप्रदायिक तनाव भड़काने के आरोप लगे थे. उनका Political जीवन हिंसा में कथित संलिप्तता के आरोपों से घिरा रहा, जिसके कारण उन्हें “बंगाल का कसाई” कहा जाने लगा.

फिर भी, जवाहरलाल नेहरू ने तत्कालीन वित्त मंत्री जॉन मथाई को सुहरावर्दी के कथित कर-अनियमितताओं के बारे में पत्र लिखा. तत्कालीन Prime Minister नेहरू ने चिंता जताई कि यदि ऐसे विवादों का समाधान नहीं किया गया तो इससे शासन की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है. बाद में सुहरावर्दी Pakistan चले गए और अपने इस विवादास्पद अतीत के बावजूद 1956 में Pakistan के Prime Minister बने.

बताया जाता है कि सुहरावर्दी की व्यक्तिगत शिकायत के आधार पर नेहरू ने 12 दिसंबर 1948 को अपने वित्त मंत्री जॉन मथाई को पत्र लिखकर बंगाल के पूर्व Prime Minister के खिलाफ भारी आयकर निर्धारण का मुद्दा उठाया. सुहरावर्दी ने शिकायत की थी कि 1945-46 और 1946-47 के लिए उन पर लगभग 50 लाख रुपये का कर लगाया गया है और आयकर विभाग उन्हें परेशान कर रहा है.

मामले को कर अधिकारियों पर छोड़ने के बजाय नेहरू ने हस्तक्षेप किया. उन्होंने सुहरावर्दी की शिकायतों को मथाई तक पहुंचाया और चेतावनी दी कि किसी भी प्रकार की “मनमानी” कार्रवाई के गंभीर Political परिणाम हो सकते हैं.

नेहरू ने लिखा, “सुहरावर्दी ने मुझे जो बताया है, वह सही भी हो सकता है, गलत भी हो सकता है या आंशिक रूप से सही हो सकता है. हालांकि मुझे स्वीकार करना होगा कि इसने मुझे बहुत विचलित किया है और मुझे लगता है कि यह जानने के लिए पूरी जांच होनी चाहिए कि वास्तव में क्या हुआ और कैसे हुआ.”

उन्होंने पत्र में आगे लिखा, “बंगाल के Prime Minister के रूप में सुहरावर्दी का रिकॉर्ड अत्यंत खराब था लेकिन आपको याद होगा कि बाद में उन्होंने गांधीजी के साथ स्वयं को जोड़ा था और निस्संदेह शांति बनाए रखने में काफी सहायता की थी.”

आलोचकों के अनुसार, यह टिप्पणी मानो सुहरावर्दी पर लगे आरोपों को कमतर आंकने या उन्हें कुछ हद तक निर्दोष ठहराने जैसी प्रतीत होती है. उसी दिन नेहरू ने पश्चिम बंगाल के Chief Minister बिधान चंद्र रॉय को भी पत्र लिखकर इस कर निर्धारण को “असाधारण” बताया और अधिक जानकारी मांगी.

अपने पत्र में तत्कालीन Prime Minister नेहरू ने इस बात पर जोर दिया कि सुहरावर्दी के कर मामलों को निष्पक्षता से संभाला जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि Political विवादों को विधिसम्मत प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, जो प्रशासनिक ईमानदारी और निष्पक्षता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है.

नेहरू ने लिखा, “मैं इस (सुहरावर्दी के आयकर निर्धारण) से परेशान हूं और इसकी जांच करवाना चाहता हूं. सुहरावर्दी के बारे में हमारे जो भी विचार हों, विशेषकर उनके पिछले आचरण को लेकर, हम किसी भी हालत में मनमाने ढंग से कार्य नहीं कर सकते. इसके दूरगामी Political परिणाम हो सकते हैं.”

हालांकि, सुहरावर्दी कोई साधारण करदाता नहीं थे. वे उन सबसे विवादास्पद नेताओं में से एक थे जिन्हें 1946 में कलकत्ता में हुए डायरेक्ट एक्शन डे के दौरान बंगाल के Prime Minister के रूप में उनकी भूमिका के लिए याद किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप भयंकर सांप्रदायिक हिंसा भड़की थी.

इन पत्रों का स्वर एक जटिल संतुलन को दर्शाता है- एक ओर सुहरावर्दी के विभाजनकारी अतीत को स्वीकार करना और दूसरी ओर यह जोर देना कि विवादास्पद व्यक्तियों को भी भारतीय कानून के तहत निष्पक्ष व्यवहार मिलना चाहिए.

जहां सुहरावर्दी का सांप्रदायिक हिंसा से जुड़ाव एक नैतिक चुनौती प्रस्तुत करता था, वहीं जवाहरलाल नेहरू के पत्र यह दिखाते हैं कि वे न्याय के सिद्धांत और बंगाल के रक्तरंजित इतिहास की स्मृतियों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहे थे. नेहरू के लेखन से यह भी स्पष्ट होता है कि विभाजन के तुरंत बाद भारत-Pakistan संबंधों के संदर्भ में वे विशेष रूप से सतर्क थे. Pakistan की राजनीति में सुहरावर्दी की उपस्थिति इस मामले को एक कूटनीतिक आयाम भी देती थी.

ऐसा प्रतीत होता है कि उनके कर विवाद को सुलझाने का यह प्रयास ऐतिहासिक महत्व और संवेदनशीलताओं की अपेक्षा सीमा पार Political धारणाओं और प्रभावों से अधिक प्रेरित था.

जवाहरलाल नेहरू की चिंता केवल कर निर्धारण तक सीमित नहीं थी बल्कि इस बात को लेकर भी थी कि Government द्वारा इतने प्रमुख मुस्लिम नेता के साथ किए गए व्यवहार के व्यापक Political परिणाम क्या हो सकते हैं.

इन पत्रों से उभरने वाली विडंबना उल्लेखनीय है- एक ओर नेहरू धर्मनिरपेक्षता और निष्पक्षता के प्रबल समर्थक थे, वहीं दूसरी ओर वे ऐसे व्यक्ति की विरासत से जुड़े विवादों में उलझे दिखाई देते हैं, जिस पर सांप्रदायिक विभाजन को गहरा करने के आरोप लगाए जाते रहे हैं.

पीएम

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