
वॉशिंगटन, 2 जुलाई . अमेरिकी सांसदों ने कॉलेज खिलाड़ियों को भारी-भरकम टैक्स के बोझ से बचाने के लिए सुधारों की मांग की है. उनका कहना है कि नेम, इमेज एंड लाइकेनेस (एनआईएल) समझौतों के तेजी से बढ़ते चलन के कारण कई युवा खिलाड़ी पर्याप्त मार्गदर्शन के अभाव में जटिल कर व्यवस्था को समझने और उसका पालन करने में कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं.
इस हफ्ते मल्टी-बिलियन डॉलर की स्पोर्ट्स इंडस्ट्री पर ‘हाउस वेज एंड मीन्स कमिटी’ की सुनवाई के दौरान, दोनों पार्टियों के सांसदों को जानकारी मिली कि स्टूडेंट एथलीट, जिनमें से कई अभी टीनएज हैं, एंडोर्समेंट डील्स से लाखों डॉलर कमा रहे हैं, लेकिन अक्सर उन्हें अपनी टैक्स देनदारियों के बारे में पता नहीं होता है.
पूर्व एनएफएल लाइनबैकर और ईएसपीएन एनालिस्ट सैम अचो ने सांसदों को एक 18 वर्षीय फुटबॉल खिलाड़ी का उदाहरण देते हुए बताया कि खिलाड़ी ने एनआईएल समझौतों के जरिए 7.5 लाख अमेरिकी डॉलर कमाए. उसने अपनी मां के लिए एक घर खरीदा, एक कार ली और एक अपार्टमेंट किराए पर लिया, लेकिन बाद में उसे पता चला कि उसके पास केवल लगभग 6,000 अमेरिकी डॉलर ही बचे हैं, जबकि उस पर करीब 3.2 लाख अमेरिकी डॉलर का टैक्स बकाया है, क्योंकि उसकी आय से पहले ही कोई टैक्स नहीं काटा गया था.
अचो ने कहा, “टैक्स कोड किसी ऐसे 17 साल के कॉलेज फुटबॉल खिलाड़ी के लिए नहीं बनाया गया था जिसे अचानक बहुत सारा पैसा मिल जाए.” उन्होंने कांग्रेस से एनआईएल पेमेंट से अनिवार्य रूप से टैक्स काटने और स्टूडेंट-एथलीट्स के लिए बेहतर वित्तीय साक्षरता पर विचार करने का आग्रह किया.
पूर्व इंटरनल रेवेन्यू सर्विस (आईआरएस) अधिकारी थड मैडेन ने कहा कि एनआईएल कमाई करने वाले कॉलेज एथलीट्स को कर्मचारियों के बजाय ‘सेल्फ-एम्प्लॉयड इंडिपेंडेंट कॉन्ट्रैक्टर’ माना जाता है. नतीजतन, उन्हें बिना स्वत: कटौती के फेडरल इनकम टैक्स के साथ-साथ सोशल सिक्योरिटी और मेडिकेयर टैक्स भी चुकाना पड़ता है. मैडेन ने कमिटी से कहा, “हाई स्कूल से निकले 18 साल के युवा के लिए यह बहुत बड़ी बात है.”
उन्होंने कहा कि कई एथलीट कॉलेज छोड़ने के समय भारी टैक्स देनदारियों के साथ निकलते हैं क्योंकि वे टैक्स के लिए पैसे अलग रखने से पहले ही अपनी कमाई खर्च कर देते हैं. मैडेन ने तर्क दिया कि एनआईएल पेमेंट से अनिवार्य कटौती से नियमों का पालन बेहतर होगा और युवा एथलीट्स को आईआरएस के कर्ज में फंसने से बचाया जा सकेगा.
दोनों पार्टियों के कई सांसदों ने कॉलेज एथलीट्स के बीच वित्तीय साक्षरता को बेहतर बनाने के लिए समर्थन किया. गवाहों ने कहा कि कई यूनिवर्सिटी खिलाड़ियों को कॉन्ट्रैक्ट, टैक्स और दीर्घकालिक वित्तीय योजनाओं के बारे में शिक्षित करने के बजाय मुख्य रूप से एथलेटिक प्रदर्शन पर ध्यान देती हैं.
अचो ने सांसदों से कहा कि “खिलाड़ियों को फैंस की नहीं, बल्कि सलाहकारों की जरूरत है.” इसके साथ ही उन्होंने तर्क दिया कि कई एथलीट्स के पास कॉन्ट्रैक्ट, टैक्स और निवेश के फैसलों को समझने के लिए भरोसेमंद सलाहकार नहीं होते.
कानून बनाने वालों ने स्पोर्ट्स इंडस्ट्री की व्यापक आर्थिक स्थिति पर भी गौर किया, जिसमें करदाताओं के पैसे से बने स्टेडियम, टैक्स-फ्री म्युनिसिपल बॉन्ड और प्रोफेशनल स्पोर्ट्स फ्रेंचाइजी पर लगने वाले टैक्स के नियम शामिल हैं. अर्थशास्त्रियों ने सवाल उठाया कि क्या स्टेडियम बनाने के लिए दी जाने वाली अरबों डॉलर की Governmentी छूट से स्थानीय समुदायों को कोई ठोस आर्थिक फायदा होता है.
गवाहों ने बताया कि एफ-1 वीजा पर आने वाले विदेशी छात्रों को इमिग्रेशन और टैक्स नियमों की वजह से अतिरिक्त मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, जबकि यूनिवर्सिटी कॉलेज स्पोर्ट्स में इंटरनेशनल टैलेंट पर अधिक निर्भर होती जा रही हैं.
इस बहस का महत्व अमेरिका से कहीं ज्यादा है. अमेरिकी यूनिवर्सिटी लगातार बड़ी संख्या में इंटरनेशनल स्टूडेंट एथलीट्स को आकर्षित कर रही हैं, जिनमें India के छात्र भी शामिल हैं. इनमें से कई छात्र हायर एजुकेशन के साथ-साथ एनसीएए प्रोग्राम में भी हिस्सा लेते हैं.
जैसे-जैसे एनआईएल के अवसर बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे अमेरिका में पढ़ाई कर रहे भारतीय खिलाड़ियों को भी उन टैक्स और वित्तीय योजना संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जिन पर अमेरिकी सांसद चिंता जता रहे हैं.
–
आरएसजी