उमर खालिद-शरजील इमाम को बिना ट्रायल जेल में रखना गलत: कांग्रेस नेता हुसैन दलवई

Mumbai , 13 अगस्त . कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हुसैन दलवई ने यूएपीए के तहत लंबे समय से जेल में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम को लेकर केंद्र Government और न्याय व्यवस्था पर टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को वर्षों तक बिना ट्रायल के जेल में रखा जाता है तो यह उसके लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों का गंभीर सवाल है. दलवई ने दोनों की जल्द रिहाई की मांग करते हुए कहा कि अदालतों को नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए. इसके साथ ही उन्होंने आजम खान को लेकर शिवपाल यादव की टिप्पणी, यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और Samajwadi Party के संभावित गठबंधन, Himachal Pradesh Government पर कंगना रनौत के आरोपों और एफसीआरए संशोधन विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजे जाने पर भी अपनी राय रखी.

यूएपीए के तहत उमर खालिद और शरजील इमाम की लंबे समय से जारी हिरासत को लेकर हुसैन दलवई ने केंद्र Government की आलोचना की. उन्होंने कहा कि उमर खालिद को करीब छह वर्षों से और शरजील इमाम को करीब सात वर्षों से जेल में रखा गया है. किसी व्यक्ति को इतने लंबे समय तक बिना मुकदमे के जेल में रखना लोकतांत्रिक अधिकारों के लिहाज से गंभीर विषय है. यदि छह-सात वर्षों में भी मुकदमा आगे नहीं बढ़ रहा है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर व्यक्ति को इतने लंबे समय तक जेल में रखने का आधार क्या है.

अदालत की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि न्यायपालिका का काम नागरिकों के संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करना है. अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक बिना सुनवाई के जेल में न रखा जाए.

उमर खालिद के अकादमिक कार्यों का जिक्र करते हुए दलवई ने कहा कि उमर खालिद ने Jharkhand के सिंहभूम क्षेत्र के आदिवासी समुदायों पर शोध किया है. यह शोध केवल किताबें पढ़कर नहीं किया गया, बल्कि उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों में जाकर लोगों से मुलाकात की और उनके जीवन, परिस्थितियों को समझने का प्रयास किया. देश में बौद्धिक और अकादमिक परंपरा को मजबूत करने की जरूरत है और किसी व्यक्ति को उसके विचारों या शोध के कारण वर्षों तक जेल में रखना उचित नहीं है. यूएपीए जैसे कानून के इस्तेमाल पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि कानून और उसके इस्तेमाल दोनों पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है.

हुसैन दलवई ने कहा कि India संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित देश है. हर नागरिक को अपनी बात रखने और अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार संविधान देता है. केंद्र Government पर निशाना साधते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर करने का प्रयास नहीं होना चाहिए. देश की न्यायपालिका को स्वतंत्र रूप से नागरिक अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए. यदि मुकदमा वर्षों तक शुरू नहीं हो पा रहा है तो अदालत को मामले की गंभीरता से समीक्षा करनी चाहिए. उन्होंने उमर खालिद और शरजील इमाम को जल्द राहत देने की मांग की.

आजम खान को गृह मंत्री बनाए जाने संबंधी शिवपाल यादव की टिप्पणी पर हुसैन दलवई ने कहा कि किसी को भविष्य में कौन सा पद मिलेगा, यह अलग Political विषय है, लेकिन आजम खान के साथ जिस तरह का व्यवहार हो रहा है, वह उचित नहीं है. आजम खान ने एक विश्वविद्यालय की स्थापना की और इसे लेकर किसी भी प्रकार की कार्रवाई या उसे नुकसान पहुंचाने की बात गलत है. शिक्षा के संस्थानों को मजबूत किया जाना चाहिए, न कि उन्हें तोड़ने या कमजोर करने की बात की जानी चाहिए. आजम खान की हिरासत पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि Political मतभेदों के बावजूद किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और Samajwadi Party के बीच संभावित गठबंधन को लेकर पूछे गए सवाल पर हुसैन दलवई ने कहा कि फिलहाल वह इस पर कोई अंतिम घोषणा नहीं कर सकते. हालांकि, उन्होंने संकेत दिया कि दोनों दलों के बीच गठबंधन की संभावना है. दलवई ने कहा कि कांग्रेस और Samajwadi Party दोनों विपक्षी इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं और चुनाव से पहले दोनों दल आपस में बातचीत करके सीटों और रणनीति को लेकर समाधान निकाल सकते हैं. चुनाव में गठबंधन होगा या नहीं, इसका अंतिम फैसला संबंधित दलों के नेतृत्व और बातचीत के आधार पर ही होगा.

Himachal Pradesh Government को लेकर Actress और BJP MP कंगना रनौत की ओर से लगाए गए आरोपों पर हुसैन दलवई ने तीखी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कंगना रनौत की Political और सार्वजनिक टिप्पणियों को ज्यादा महत्व देने से इनकार किया. दलवई ने उनकी अभिनय क्षमता पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि वह उनके बयानों पर प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं समझते.

एफसीआरए संशोधन विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजे जाने के फैसले पर हुसैन दलवई ने कहा कि Government को विधेयक को जेपीसी के पास भेजने के लिए सहमत होना इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं उसे विपक्ष और अन्य पक्षों की आपत्तियों को ध्यान में रखना पड़ा है. जेपीसी में विधेयक पर विस्तार से चर्चा होगी और विभिन्न पक्षों के सुझाव और आपत्तियां सामने आएंगी. इसके बाद यह तय होगा कि विधेयक के अंतिम स्वरूप में क्या बदलाव किए जाते हैं.

पीएसके

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