अशोक गहलोत: सादगी और कल्याणकारी कदमों से तीन बार बने राजस्थान के सीएम, सत्ता से बाहर होने के बाद भी राजनीति हावी

New Delhi, 2 मई . जब भी हम Rajasthan की राजनीति को देखते हैं, तो वह अशोक गहलोत के जिक्र के बिना अधूरी होती है. 3 मई 1951 को जोधपुर में जन्मे अशोक गहलोत की सादगी और जमीनी पकड़ को सबसे पहले तत्कालीन Prime Minister इंदिरा गांधी ने पहचाना था. महज 31 साल की उम्र में, 2 सितंबर 1982 को इंदिरा गांधी ने उन्हें अपनी कैबिनेट में पर्यटन और नागरिक उड्डयन उप मंत्री का प्रभार सौंपा. फरवरी 1984 में वे खेल उप मंत्री बने.

इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी ने भी इस युवा चेहरे पर भरोसा जताया और दिसंबर 1984 में उन्हें पर्यटन और नागरिक उड्डयन का राज्य मंत्री बनाया गया. यह गहलोत की कार्य कुशलता ही थी कि 1991 में पीवी नरसिम्हा राव की Government में उन्हें कपड़ा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जैसी अहम जिम्मेदारी मिली.

अशोक गहलोत की असली कर्मभूमि तो रेगिस्तान का वह प्रदेश था, जो उनका इंतजार कर रहा था. Rajasthan के Chief Minister के रूप में उनकी तीन कार्यकालों (1998-2003, 2008-2013, और 2018-2023) ने उन्हें Rajasthan के सबसे कद्दावर नेताओं की सूची में सबसे ऊपर ला खड़ा किया.

अशोक गहलोत के तीसरे कार्यकाल (2018-2023) को Rajasthan में ‘कल्याणकारी राजनीति’ के स्वर्ण युग के रूप में याद किया जाता है. 1 मई 2021 यानी मजदूर दिवस के दिन उन्होंने ‘Chief Minister चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना’ का ऐसा कार्ड चला जिसने स्वास्थ्य सेवा के अर्थशास्त्र को ही बदलकर रख दिया.

शुरुआत में हर परिवार को 5 लाख रुपए का कैशलेस बीमा मिला, जिसे बाद में बढ़ाकर 25 लाख रुपए कर दिया गया, साथ ही 10 लाख का दुर्घटना बीमा भी जोड़ा गया. यह आम आदमी के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं था, लेकिन अशोक गहलोत यहीं नहीं रुके. 21 मार्च 2023 को वे ‘Rajasthan स्वास्थ्य का अधिकार अधिनियम’ लेकर आए. Rajasthan देश का पहला राज्य बन गया जिसने स्वास्थ्य को कानूनी अधिकार बना दिया.

इस कानून ने अनिवार्य कर दिया कि कोई भी अस्पताल आपातकालीन स्थिति में मरीज को इलाज से मना नहीं कर सकता और न ही एडवांस पैसे मांग सकता है. हालांकि यह कदम बेहद विवादास्पद रहा. ‘आपातकाल’ की स्पष्ट परिभाषा न होने के कारण निजी अस्पतालों और डॉक्टरों ने सड़कों पर उतरकर भारी विरोध किया. डॉक्टरों ने इसे ‘काला कानून’ बताया, लेकिन गहलोत अपने इरादों पर अडिग रहे.

2023 के चुनावों से ठीक पहले गहलोत ने महंगाई के खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी बहस छेड़ दी. उन्होंने पूरे राज्य में ‘महंगाई राहत शिविर’ लगाए. गैस सिलेंडर जो बाजार में 1,150 रुपए का था, वह गरीबों को 500 रुपए में दिया गया. हर घर को 100 यूनिट और किसानों को 2,000 यूनिट मुफ्त बिजली दी गई. शहरों में रहने वाले बेरोजगारों के लिए ‘इंदिरा गांधी शहरी रोजगार गारंटी योजना’ शुरू की गई.

चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में अशोक गहलोत की व्यक्तिगत लोकप्रियता आसमान छू रही थी. भाजपा का कोई भी स्थानीय नेता उनके कद के बराबर नहीं था, लेकिन Rajasthan की राजनीति का एक पुराना समाजशास्त्र यह रहा है कि हर पांच साल में सत्ता बदलती है. अपनी तमाम बेहतरीन योजनाओं और ‘ओल्ड पेंशन स्कीम’ के बावजूद दिसंबर 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा.

2026 में 75 वर्षीय अशोक गहलोत एक बेहद सक्रिय, आक्रामक और रणनीतिक विपक्षी नेता के रूप में अपनी भूमिका निभा रहे हैं.

वे एआईसीसी की शक्तिशाली ‘कोर ग्रुप कमेटी’ के अहम रणनीतिकार हैं. Rajasthan में वे Chief Minister भजन लाल शर्मा की Government के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं. उनका ‘एक्स’ हैंडल एक डिजिटल तलवार की तरह चलता है.

सत्ता हो या विपक्ष, अशोक गहलोत ने साबित कर दिया है कि वह एक ऐसे राजनेता हैं जिनकी प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं होती. मौजूदा समय में, वह सरदारपुरा से विधायक हैं.

वीकेयू/वीसी

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