
New Delhi, 24 अप्रैल . भारतीय राजनीति में चुनाव दर चुनाव कई मिथक बनते और टूटते हैं, लेकिन साल 2026 के विधानसभा चुनावों ने Political विश्लेषकों को अपने पुराने फॉर्मूले किनारे रखने पर मजबूर कर दिया है. चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) के बाद पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी में हुए चुनावों ने वोटिंग प्रतिशत के ऐसे रिकॉर्ड कायम किए हैं, जो आजादी के बाद से अब तक नहीं देखे गए थे.
एसआईआर लागू होने के बाद हो रहे विधानसभा चुनाव भारतीय लोकतंत्र के लिए एक ‘टेस्टिंग लैब’ बन गए हैं. एक तरफ एसआईआर ने चुनाव प्रक्रिया से फर्जीवाड़े को खत्म कर असल लोकतंत्र की तस्वीर पेश की है, तो दूसरी तरफ महिला मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी ने चुनाव के पुराने ढर्रे को कन्फ्यूज कर दिया है.
पश्चिम बंगाल के पहले चरण में 92 प्रतिशत से ज्यादा और तमिलनाडु में 85.15 प्रतिशत का ऐतिहासिक मतदान दर्ज किया गया है, लेकिन इस बंपर वोटिंग के मायने क्या हैं? क्या यह सत्ता विरोधी लहर है या फिर ‘प्रो-इनकंबेंसी’ (सत्ता के पक्ष में) का नया ट्रेंड?
चुनाव आयोग ने 2026 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले देशभर में मतदाता सूचियों को पारदर्शी बनाने के लिए ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (एसआईआर) अभियान चलाया था. इसका मकसद मृत, दोहरी प्रविष्टि वाले (डुप्लीकेट), स्थायी रूप से शिफ्ट हो चुके और गैर-नागरिक मतदाताओं के नाम हटाना था. इस प्रक्रिया के बाद पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी में चुनाव संपन्न हुए हैं.
इसके अलावा बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी एसआईआर का काम जोरों पर रहा है. एसआईआर के बाद बिहार विधानसभा का चुनाव 2025 में संपन्न हुआ है और उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होना है. एसआईआर से पहले और बाद के वोटिंग प्रतिशत में एक बड़ा और ऐतिहासिक उछाल देखने को मिला है.
पश्चिम बंगाल में साल 2021 के विधानसभा चुनाव में कुल वोटिंग 81.5 प्रतिशत थी, लेकिन एसआईआर के बाद 2026 के पहले चरण में यह आंकड़ा पहले चरण में ही 92.88 प्रतिशत (करीब 93 प्रतिशत) तक पहुंच गया. महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से ज्यादा रही. महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत 92.69 प्रतिशत और पुरुषों का वोटिंग प्रतिशत 90.92 प्रतिशत रहा और थर्ड जेंडर के वोटिंग प्रतिशत की बात करें, तो यह करीब 56.79 प्रतिशत रहा.
आंकड़ों में देखें तो कुल वोटरों की संख्या 3.6 करोड़ रही, जिसमें 1.76 करोड़ महिलाएं, 1.84 करोड़ पुरुष और 465 थर्ड जेंडर थे.
वरिष्ठ पत्रकार और Political विश्लेषक सुवाशीष मैत्रा ने कहा, “मौजूदा Political हालात का विश्लेषण करते हुए उन्होंने कहा, “चुनाव का पहला चरण 152 सीटों पर हुआ, जिनमें से 2021 में भाजपा ने 59 सीटें जीती थीं. अगर इस बार पार्टी इन सीटों में से 80 सीटें भी जीत लेती है, तो भी उसे अगले चरण में होने वाले 142 सीटों के चुनाव में से 68 और सीटें जीतनी होंगी. 2021 में, भाजपा इन इलाकों में 18 सीटें ही जीत पाई थी, जिसका स्ट्राइक रेट करीब 13 प्रतिशत था.”
तमिलनाडु में 2021 में 73.63 प्रतिशत वोटिंग हुई थी. एसआईआर के बाद यह आंकड़ा उछलकर 85.15 प्रतिशत हो गया, जो राज्य के इतिहास में सर्वाधिक है.
इतनी भारी वोटिंग के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण दिख रहे हैं. इस चुनाव का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि महिला वोटरों की संख्या पुरुषों के मुकाबले औसतन 2 से 5 प्रतिशत अधिक रही है. इसके पीछे केंद्र और राज्य Governmentों की ‘महिला केंद्रित योजनाएं’ एक बड़ा कारण हैं. चाहे केंद्र की उज्ज्वला, आवास, और मुद्रा योजना हो या राज्यों की लाडली बहना (एमपी), महतारी वंदन (छत्तीसगढ़), और लक्ष्मीर भंडार (बंगाल), मंईयां सम्मान (Jharkhand), लाडकी बहिण (Maharashtra) जैसी योजनाएं हों, इन सभी ने महिलाओं को एक ‘स्वतंत्र और साइलेंट वोटर’ वर्ग में तब्दील कर दिया है. महिलाएं अपनी इन लाभकारी योजनाओं को सुरक्षित रखने के लिए भारी संख्या में घरों से निकलकर वोट कर रही हैं.
एसआईआर के दौरान लाखों ‘फर्जी या मृत’ मतदाताओं के नाम हटाए गए. उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल में करीब 91 लाख और तमिलनाडु में 57 लाख नाम सूची से हटे. जब कुल मतदाताओं की संख्या कम हो गई और असली मतदाताओं ने वोट डाला तो प्रतिशत का आंकड़ा गणितीय रूप से अपने आप उछल गया.
एसआईआर के दौरान हुए वेरिफिकेशन के कारण आम लोगों, विशेषकर प्रवासी मजदूरों में एक डर पैदा हो गया कि अगर उन्होंने वोट नहीं डाला तो उनका नाम कट जाएगा.
भारतीय राजनीति का एक पुराना ढर्रा या मिथक रहा है कि जब भी वोटिंग प्रतिशत में अचानक उछाल आता है, तो माना जाता है कि जनता गुस्से में है और सत्ताधारी दल की विदाई तय है. 2011 में पश्चिम बंगाल में 84.3 प्रतिशत की रिकॉर्ड वोटिंग हुई थी, तब 34 साल पुरानी वामपंथी Government सत्ता से बाहर हुई थी, लेकिन हाल ही में Haryana और Maharashtra के विधानसभा चुनावों ने इस मिथक को चकनाचूर कर दिया है.
इन राज्यों में बंपर वोटिंग के बावजूद पुरानी Governmentों (सत्तारूढ़ गठबंधनों) ने प्रचंड बहुमत के साथ मजबूत वापसी की. यह इस बात का संकेत है कि अब भारी वोटिंग ‘एंटी-इनकंबेंसी’ (सत्ता विरोध) के बजाय ‘प्रो-इनकंबेंसी’ (सत्ता के समर्थन) का भी प्रतीक बन गई है. लाभार्थी वर्ग (खासकर महिलाएं) अपनी Government को बचाने के लिए आक्रामक रूप से वोट कर रहा है. यह भारतीय राजनीति का एक बिल्कुल नया ट्रेंड है. एसआईआर के बाद बिहार में हुए विधानसभा चुनावों में भी ‘प्रो-इनकंबेंसी’ (सत्ता के समर्थन) देखने को मिला, जहां (सत्तारूढ़ गठबंधनों) की सीटों में काफी बढ़ोतरी हुई है.
अगर सियासत का पुराना फॉर्मूला लागू होता है, तो पश्चिम बंगाल में पहले चरण में हुई करीब 93 प्रतिशत वोटिंग ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ भारी असंतोष का परिचायक हो सकती है. इसका सीधा फायदा मुख्य विपक्षी दल यानी भाजपा को मिल सकता है. उसी तरह, तमिलनाडु में यह डीएमके Government के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर का संकेत हो सकता है, जिसका फायदा विपक्ष को मिल सकता है.
अगर Haryana और Maharashtra वाला नया ‘प्रो-इनकंबेंसी ट्रेंड’ यहां हावी रहता है, तो इसका मतलब है कि सत्तारूढ़ दल ही खुद को रिपीट करेगा. पश्चिम बंगाल में ‘लक्ष्मीर भंडार’ पाने वाली महिलाओं और एसआईआर के डर से वोट करने वाले अल्पसंख्यकों ने अगर टीएमसी के पक्ष में मत की होगी, तो ममता बनर्जी सत्ता में फिर से वापसी कर सकती हैं. वहीं तमिलनाडु में भी स्टालिन Government की कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी उन्हें वापस ला सकते हैं.
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वीकेयू/वीसी