‘सहिया’ पर सेंसर बोर्ड की आपत्ति, संजय शर्मा ने रचनात्मक स्वतंत्रता पर उठाए सवाल

New Delhi, 2 नवंबर . कैमरे के सामने इंकलाब, कैमरे के बाहर खामोशी. पर्दे पर अन्याय से भिड़ने वाले नायक असल जिंदगी में क्या बुजदिल होते हैं. जनता पर बरसती लाठियों और पानी की बौछारों के बीच आखिर यह फिल्मी हीरो कहां गायब हो जाते हैं? करोड़ों की कमाई लाखों प्रशंसक social media पर पोस्टों की बौछार, लेकिन जब जनता अपने हक के लिए सड़क पर उतरती है तब बड़े-बड़े सितारों की जुबान पर ताले क्यों लटक जाते हैं? इनमें चाहे शहंशाह हो या फिर कोई और. Mumbai के अंधेरी पश्चिम स्थित मुक्ति ऑडिटोरियम में आयोजित तहजीब के मंच से संपादक संजय शर्मा ने Bollywood की चुप्पी पर सवालों के वार ने शांत समुंदर में तूफान ला खड़ा किया. तहजीब के मंच पर रियल हीरो मनोज बाजपेई बैठे थे जो संजय शर्मा के सवालों का जवाब दे रहे थे. संजय शर्मा का सवाल सीधा था, मगर निशाना पूरी स्टार संस्कृति की चमकदमक पर था कि स्टार खमोश क्यों रहते हैं इस सवाल के जवाब में और मनोज ने भी दो टूक पूछ लिया कि, “जो लोग जनता के मुद्दों पर खामोश रहते हैं, उन्हें आप स्टार ही क्यों मानते हैं?”
बस, यहीं से शुरू हुई असली बहस! स्टारडम आखिर है क्या? महंगे कपड़े, चमकती तस्वीरें और social media पर मौजूदगी या अन्याय के खिलाफ बोलने का साहस. संजय शर्मा ने अमिताभ बच्चन की social media सक्रियता का जिक्र करते हुए बड़े मुद्दों पर उनकी खामोशी का सवाल उठाया, लेकिन मनोज बाजपेयी ने किसी एक Actor पर व्यक्तिगत हमला करने के बजाय पूरी जमात के सामने आईना रख दिया. और बात सिर्फ सितारों की चुप्पी तक सीमित नहीं रही. जब संजय शर्मा की फिल्म ‘सहिया’ के प्रमाणन पर रोक और रचनात्मक अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल उठा तो मनोज ने साथ खड़े होने का भरोसा दिया और कहा कि “आप आगे बढ़िए, हम आपके साथ हैं.”
संजय शर्मा ने मनोज बाजपेयी से नसीरुद्दीन शाह और पीयूष मिश्रा के वैचारिक मतभेदों को लेकर सवाल किया. उन्होंने पूछा कि दोनों कलाकारों के विचारों और सार्वजनिक बयानों को लेकर मनोज बाजपेयी की क्या राय है और वे किस कलाकार के विचारों के अधिक करीब हैं. उन्होंने इस सवाल का जवाब देते नसीरुद्दीन शाह के लिए कहा कि वह उनका इतना सम्मान करते हैं कि अगर वह उन्हें थप्पड़ भी मार दें तो वह स्वीकार कर लेंगे. यह टिप्पणी उनके व्यक्तिगत आदर की तीव्रता दिखाती है. विचारों के मतभेद के बीच भी किसी कलाकार के प्रति सम्मान बनाए रखने का यह बयान बातचीत को एक और आयाम देता है. पीयूष मिश्रा और नसीरुद्दीन शाह के विचारों को लेकर चल रही बहस के बीच मनोज बाजपेयी का यह बयान विशेष महत्व रखता है. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपनी राय रखने और असहमति जाहिर करने का अधिकार है. किसी कलाकार का अपनी बात खुलकर कहना उसके खिलाफ नहीं जाना चाहिए. समाज में अलग-अलग विचारों के लिए जगह होना जरूरी है.
कार्यक्रम का दूसरा बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा तब सामने आया जब संजय शर्मा ने अपनी फिल्म ‘सहिया’ को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा प्रमाणपत्र देने से इनकार किए जाने और इसके खिलाफ चल रही कानूनी लड़ाई का जिक्र किया. संजय शर्मा ने बताया कि उनकी फिल्म ‘सहिया’ मूल रूप से एक प्रेम कहानी है, लेकिन सेंसर बोर्ड ने इस पर नक्सलवाद और आदिवासियों के शोषण जैसे आरोप लगाते हुए इसके प्रमाणन पर रोक लगा दी है. उन्होंने मनोज बाजपेयी से पूछा कि आखिर फिल्मकारों को अपनी बात कहने की कितनी आजादी मिलनी चाहिए और क्या इस तरह की सेंसरशिप रचनात्मक स्वतंत्रता के लिए खतरा नहीं है?
इस सवाल पर मनोज बाजपेयी ने सेंसरशिप के प्रति अपना विरोध जताते हुए संजय शर्मा के संघर्ष का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि संजय शर्मा इस लड़ाई में भी जीतेंगे. मनोज बाजपेयी ने अब तक के संघर्षों का उल्लेख करते हुए कहा कि आपने इतने बड़े-बड़े संघर्ष किए हैं, हर मोर्चे पर लड़ाई लड़ी है, और इतना बड़ा मीडिया नेटवर्क खड़ा किया है. उन्हें विश्वास है कि जिस तरह अब तक आपने चुनौतियों का सामना किया है, उसी तरह सेंसर बोर्ड के खिलाफ भी अपनी लड़ाई जारी रखेंगे और जीतेंगे.
इस कार्यक्रम की खासियत यह भी रही कि बातचीत केवल संजय शर्मा और मनोज बाजपेयी तक सीमित नहीं थी. सभागार में मौजूद दर्शकों को भी Actor से सीधे सवाल पूछने का मौका मिला. दर्शकों ने अभिनय, सिनेमा, Bollywood, राजनीति, सामाजिक परिस्थितियों और व्यक्तिगत अनुभवों से जुड़े कई सवाल किए, जिनका मनोज बाजपेयी ने सहजता से जवाब दिया.
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एमएस/


