
New Delhi, 16 सितंबर . भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाए जाने के फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए केंद्र Government से इसे तत्काल वापस लेने की मांग की है. पार्टी का कहना है कि यूपीआई एक सार्वजनिक डिजिटल भुगतान व्यवस्था है, जिसे आम जनता की सुविधा के लिए विकसित किया गया था और इसे शुल्क आधारित व्यवस्था में बदलना जनविरोधी कदम है.
सीपीआई के राष्ट्रीय सचिवालय द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि Government भले ही यह दावा कर रही हो कि उपभोक्ताओं पर सीधे कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा लेकिन व्यावहारिक अनुभव बताता है कि व्यापारी अक्सर ऐसे अतिरिक्त खर्चों का बोझ अंततः ग्राहकों पर डाल देते हैं. पार्टी के अनुसार, 10 और 10000 रुपए के भुगतान को संसाधित करने की लागत में कोई खास अंतर नहीं होता, इसलिए लेनदेन राशि के आधार पर शुल्क लगाना तर्कसंगत नहीं है.
बयान में कहा गया कि नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) पहले से ही एक आर्थिक रूप से मजबूत संस्था है, जिसके पास पर्याप्त नकद भंडार और निवेश हैं. साथ ही, उसने Government को करोड़ों रुपए कर के रूप में भी दिए हैं. ऐसे में यूपीआई को राजस्व कमाने का माध्यम बनाने का कोई औचित्य नहीं है.
सीपीआई ने आरोप लगाया कि इस निर्णय के पीछे अमेरिकी दबाव की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. पार्टी का दावा है कि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ने India की यूपीआई और शून्य एमडीआर व्यवस्था पर आपत्ति जताते हुए इन्हें अमेरिकी भुगतान कंपनियों के लिए बाधा बताया है. सीपीआई के अनुसार, वीजा और मास्टरकार्ड जैसी कंपनियों का हित कार्ड आधारित भुगतानों को बढ़ावा देने और यूपीआई तथा रुपे को कम आकर्षक बनाने में निहित है.
पार्टी का कहना है कि 2000 से अधिक के लेनदेन यूपीआई मर्चेंट ट्रांजैक्शनों के कुल मूल्य का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा हैं और अब इन्हीं लेनदेन पर शुल्क लगाने की तैयारी की जा रही है. सीपीआई ने आरोप लगाया कि मोदी Government देश के हितों की रक्षा करने के बजाय अमेरिकी दबाव के आगे झुक गई है.
सीपीआई ने Prime Minister मोदी द्वारा यूपीआई को “डिजिटल इंडिया” की सफलता का प्रतीक बताए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि विदेशी दबाव में इसकी स्वायत्तता से समझौता करना देश की डिजिटल संप्रभुता पर धब्बा है. पार्टी के अनुसार, इससे अंततः व्यापारियों और उपभोक्ताओं पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा जबकि लाभ विदेशी भुगतान कंपनियों को मिलेगा.
बयान में कहा गया कि India के डिजिटल भुगतान तंत्र का बड़ा हिस्सा पहले ही वॉलमार्ट के स्वामित्व वाली फोनपे और अल्फाबेट के स्वामित्व वाली गूगल पे के हाथों में है, जो मिलकर लगभग 80 प्रतिशत यूपीआई लेनदेन का संचालन करती हैं. सीपीआई का आरोप है कि इन बड़ी कंपनियों से सार्वजनिक डिजिटल बुनियादी ढांचे के उपयोग का उचित शुल्क लेने के बजाय Government आम लोगों और छोटे व्यापारियों पर अतिरिक्त बोझ डालने का रास्ता अपना रही है.
पार्टी ने जोर देकर कहा कि यूपीआई को सरल, एकीकृत और कम लागत वाली भुगतान व्यवस्था के रूप में विकसित किया गया था. इसे विदेशी कॉरपोरेट हितों के अनुरूप कमजोर नहीं किया जाना चाहिए. सीपीआई ने Government से इस “जनविरोधी निर्णय” को वापस लेने और यूपीआई को पूरी तरह निशुल्क बनाए रखने की मांग की है.
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एएमटी/पीएम