
New Delhi, 8 सितंबर . हिंदी साहित्य के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्होंने बहुत कम उम्र में इतना बड़ा काम कर दिया कि आने वाली पीढ़ियां भी उन्हें याद करती रहीं. भारतेंदु हरिश्चंद्र उन्हीं नामों में से एक हैं. उन्होंने महज 34 साल की जिंदगी में कविता, नाटक, पत्रकारिता और गद्य लेखन के जरिए हिंदी को नई दिशा दी. यही वजह है कि उन्हें ‘आधुनिक हिंदी साहित्य का पितामह’ कहा जाता है.
भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को बनारस में हुआ था. उनके पिता गोपाल चंद्र खुद एक अच्छे कवि थे और ‘गिरधर दास’ नाम से रचनाएं लिखते थे. इस वजह से साहित्य का माहौल उन्हें घर से ही मिला था. लेकिन, बचपन में ही माता-पिता का निधन हो जाने से उनके जीवन में बड़ा खालीपन आ गया.
कम उम्र में माता-पिता को खोने का दर्द उनके व्यक्तित्व पर गहरा असर छोड़ गया. शायद यही वजह रही कि आगे चलकर उनकी कलम में समाज और आम इंसान के दुख-दर्द की झलक खूब दिखाई दी. उन्होंने साहित्य को सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे समाज की सच्चाई सामने रखने का जरिया बनाया.
भारतेंदु के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब किशोरावस्था में उन्होंने जगन्नाथ पुरी की यात्रा की. इस यात्रा के दौरान उन्हें बंगाल की संस्कृति और वहां के साहित्यिक माहौल को करीब से देखने का मौका मिला. बंगाल में उस समय सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव की नई लहर चल रही थी. इसका प्रभाव भारतेंदु पर भी पड़ा.
यहीं से उनके मन में नाटक और उपन्यास जैसी आधुनिक साहित्यिक विधाओं के प्रति रुचि बढ़ी. आगे चलकर उन्होंने हिंदी साहित्य में नाटक और आधुनिक गद्य को मजबूत आधार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
भारतेंदु का साहित्य अपने समय की परिस्थितियों से गहराई से जुड़ा हुआ था. देश की गुलामी, सामाजिक कुरीतियां, आर्थिक शोषण और आम लोगों की परेशानियां उनकी रचनाओं में दिखाई देती हैं. उनके प्रसिद्ध नाटकों में ‘India दुर्दशा’, ‘नील देवी’, ‘सत्य हरिश्चंद्र’ और ‘अंधेर नगरी’ प्रमुख हैं. खासकर ‘अंधेर नगरी’ आज भी हिंदी रंगमंच की चर्चित रचनाओं में शामिल है. उनकी रचनाओं में हास्य और व्यंग्य के साथ-साथ व्यवस्था पर तीखी टिप्पणी भी देखने को मिलती है.
भारतेंदु सिर्फ कवि और नाटककार नहीं थे. पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उन्होंने महत्वपूर्ण काम किया. उन्होंने ‘कविवचन सुधा’, ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’, ‘हरिश्चंद्र पत्रिका’ और ‘बालबोधिनी’ जैसी पत्रिकाओं के संपादन से हिंदी पत्रकारिता को नई दिशा दी.
‘बालबोधिनी’ के जरिए उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक जागरूकता जैसे मुद्दों को भी महत्व दिया. उस दौर में महिलाओं की शिक्षा को लेकर समाज में कई तरह की बंदिशें थीं. भारतेंदु ने लेखन और पत्रकारिता के माध्यम से इन विषयों पर चर्चा को आगे बढ़ाया.
भारतेंदु की साहित्यिक दुनिया सिर्फ हिंदी तक सीमित नहीं थी. वे उर्दू के भी अच्छे जानकार थे और ‘रसा’ तखल्लुस से उर्दू गजलें लिखते थे. उनकी शायरी में प्रेम, भावनाओं और निजी अनुभवों की झलक मिलती है.
भारतेंदु हरिश्चंद्र का निधन 6 जनवरी 1885 को बनारस में हुआ. उस समय उनकी उम्र सिर्फ 34 साल थी.
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पीआईएम/एबीएम