माता सती बनकर खुद को धन्य मानती हैं अश्मिता बख्शी, बोलीं- ये मेरा पहला स्पेशल प्रोजेक्ट

Mumbai , 16 अक्टूबर . Actress अश्मिता बख्शी पौराणिक थिएटर नाटक ‘शिव शक्ति- एक दिव्य प्रसंग कथा’ में माता सती की मुख्य भूमिका अदा कर रही हैं. Actress का कहना है कि वह खुद को बहुत खुशकिस्मत मानती हैं कि उन्हें इस नाटक में माता सती जैसा शक्तिशाली किरदार निभाने का मौका मिला.
Actress अश्मिता बख्शी ने के साथ बातचीत में अपने नाटक के बारे में बात करते हुए बताया उनके रंगमंच में दर्शकों को तीन अलग-अलग युग के बारे में पता चलेगा.
उन्होंने कहा, “देखिए, ‘शिव शक्ति- एक दिव्य प्रसंग कथा’ मेरा पहला पौराणिक प्रोजेक्ट है और जब मैं कहती हूं कि इसे एक नए नजरिए से दिखाया जा रहा है, तो आप सिर्फ एक कहानी नहीं देखेंगे. आप पौराणिक कथाओं के तीन अलग-अलग युग देखेंगे. इसका संगीत भी बहुत खूबसूरत है. गाने, कोरियोग्राफी, लेखन और निर्देशन- सब कुछ, मेरी समझ से, शानदार है. कुल मिलाकर मुझे लगता है कि यह नाटक मेरे लिए एक बहुत ही अलग और समृद्ध अनुभव होने वाला है.”
Actress ने नाटक में माता सती का किरदार निभाने के अनुभव को शेयर करते हुए कहा, “मैं खुद को बहुत खुशकिस्मत मानती हूं कि मुझे मां शक्ति का किरदार निभाने का अवसर मिला. जब मुझे इस किरदार को निभाने का मौका मिला, तो मुझे लगा कि मैं धन्य हो गई, क्योंकि शक्ति, सती और पार्वती सभी माताएं हैं. क्योंकि जिस तरह से इसे लिखा और निर्देशित किया गया है, हमें शायद पता भी नहीं चलेगा कि हमने कितनी सहजता से इन तीन युगों को निभा दिया. मेरे लिए ये पौराणिक कथा का पहला अनुभव है, इसलिए मैं इसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं कह सकती.”
Actress से ने सवाल किया, “शिव और शक्ति की प्रेम कहानी में आपके लिए कोई ऐसा मजबूत संदेश है जो आज के रिश्तों में भी काम आता हो?”
इस सवाल का जवाब देते हुए Actress ने कहा, “मैं बस यही कहना चाहूंगी कि रिश्ता चाहे सदियों पुराना हो या आज की पीढ़ी का, अपने पार्टनर के प्रति सच्चा रहना बहुत जरूरी है. अगर आप किसी के साथ हैं, तो पूरे दिल से उसके साथ रहना चाहिए और हमारा नाटक इस बात पर जोर देता है. मुझे लगता है कि किसी भी रिश्ते में सच्चाई ही सबसे जरूरी चीज होती है, बस आप जैसे हैं, वैसे ही रहें. हमारे शिवजी भी ऐसे ही हैं, उन्होंने कभी भी खुद को माता पार्वती के माता-पिता के हिसाब से नहीं बदला. वो दोनों एक-दूसरे के लिए ही बने थे, और उन्होंने एक-दूसरे को वैसे ही स्वीकार किया जैसे वो थे. मुझे लगता है कि आज की पीढ़ी के लिए यही संदेश है कि खुद के प्रति सच्चे रहो.”
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एनएस/एबीएम


