प्रयागराज में झंडों से होती है पंडों की पहचान, यजमानों के लिए आज भी बनी हुई है सदियों पुरानी परंपरा

प्रयागराज, 27 सितंबर . पितृ पक्ष की शुरुआत के साथ ही प्रयागराज के पवित्र त्रिवेणी संगम पर देश के कोने-कोने से लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध करने पहुंच रहे हैं. प्रयागराज की इस पावन भूमि पर आने वाले यजमान के लिए सदियों पुरानी ‘झंडा पहचान’ परंपरा आज भी सबसे बड़ा सहारा बनी हुई है.

प्रयागराज के संगम तट पर तीर्थ-पुरोहितों (पंडों) को दूर से पहचानने के लिए उनके वंश और क्षेत्र के अनुसार विशेष झंडे और प्रतीक चिह्न तय होते हैं, जिन्हें यजमान पीढ़ियों से पहचानते आ रहे हैं. प्रयागराज के पंडा सैकड़ों वर्षों से क्षेत्रों, जिलों या जातियों के हिसाब से बंटे हुए हैं और हर पुरोहित परिवार का एक निश्चित निशान होता है. जैसे घोड़ा, हाथी, ऊंट, कटार, तबलिया, मछली या विशेष धार्मिक चिह्न.

संगम तट पर उनके तख्त या बैठने के स्थान पर यह झंडा लगा होता है जिसे देख कर यजमान आसानी से पहुंच जाते है. डिजिटल दौर में भी तीर्थयात्री भीड़भाड़ के बीच अपने पूर्वजों के पारंपरिक पुरोहित को उनके झंडे से पहचानकर आसानी से ढूंढ लेते हैं. इन पंडों के पास पीढ़ियों पुरानी बही-खाते होते हैं, जिनमें यजमानों के पूर्वजों, सात पीढ़ियों का इतिहास और पिंडदान का पूरा लेखा-जोखा दर्ज रहता है.

तीर्थ पुरोहित प्रदीप पांडेय ने से बातचीत करते हुए कहा, “संगम क्षेत्र में तीर्थ पुरोहितों का निशान झंडा होता है. पंडा का झंडा ही निशान होता है और यजमान झंडे के निशान को देखकर आते हैं. झंडे से ही पंडों की पहचान होती है. तीर्थ पुरोहित यजमान के सात पीढ़ियों का विवरण भी दिखाते हैं. पहले जब हमारे पूर्वज यजमानों के घर जाते थे तो हमेशा झंडे के बारे में बताया जाता था. हमारे यहां की पहचान ‘राम सहाय पंडा केसरिया झंडा’ है.

पिंडदान करने आए दीपक ने से बातचीत में कहा, “झंडे की वजह से तीर्थ पुरोहितों की तलाश करने में आसानी होती है. निशान नहीं होने पर किससे बात की जाए, यह बड़ी समस्या होती है.”

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एसडी/एएस

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