पिथौरागढ़ के मां चंडिका धुरा मंदिर में गूंजता है न्याय की देवी का जयकारा, जानें इसका पौराणिक रहस्य

पिथौरागढ़, 11 सितंबर . उत्तराखंड में शक्ति उपासन के कई प्राचीन केंद्र हैं, उन्हीं में से एक है ‘मां चंडिका धुरा मंदिर’. घने जंगलों और पहाड़ों से घिरे इस मंदिर के शांत वातावरण और प्राकृतिक नजारे आकर्षण का केंद्र हैं.

चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान यहां विशेष मेलों और अनुष्ठानों का आयोजन होता है, जिसमें शामिल होने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं. हालांकि, यहां आने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च के बीच का होता है. मानसून के मौसम में पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन का खतरा रहता है, इसलिए इस दौरान यात्रा से बचना चाहिए.

Friday को उत्तराखंड के Chief Minister पुष्कर सिंह धामी ने मंदिर के लिए खास पोस्ट की. उन्होंने social media प्लेटफॉर्म एक्स पर वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा, “पिथौरागढ़ में मौजूद मां चंडिका धुरा मंदिर, देवी महाकाली को समर्पित आस्था और भक्ति का एक बड़ा केंद्र है. आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर यह पवित्र जगह अपनी बेमिसाल प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी मशहूर है. पिथौरागढ़ आने पर इस पवित्र मंदिर के दर्शन जरूर करें.”

मंदिर की प्राचीन वास्तुकला, गर्भगृह में स्थित रहस्यमयी कुंड और यहां का शांत वातावरण हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करता है. मां चंडिका को न्याय, शक्ति और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है.

‘मां चंडिका धुरा मंदिर’ पिथौरागढ़ नगर से लगभग 10 किलोमीटर दूर, घने जंगलों और पहाड़ों के बीच स्थित है. स्थानीय पहाड़ी भाषा में ‘धुरा’ का अर्थ ऊंची चोटी होता है. पहाड़ी के गर्भ (गुफा) में स्थित होने के कारण इन्हें ‘उड़ियार देवी’ भी कहते हैं

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कहा जाता है कि 15वीं शताब्दी में रामगंगा तट पर स्थित चंडिका घाट से माता के लिंग रूप को लाकर इस ऊंची चोटी पर स्थापित किया गया था. रामगंगा के तट वाला चंडिका घाट भी माँ का मूल स्थान माना जाता है.

पुरानी कथा के अनुसार, सैकड़ों वर्ष पहले मां चंडिका का मूल स्थान बुंगाछीना के हरदेव क्षेत्र में था, जहां उनकी बहन मां महानंदा देवी का भी मंदिर था. स्वभाव और प्रवृत्तियों में भिन्नता के कारण मां नंदा के कहने पर चंडिका जी ने वह स्थान छोड़ दिया और रामगंगा तट (चंडिका घाट) पर आ विराजीं.

एनएस/पीएम

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