
मथुरा, 25 सितंबर . पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) हिंदुओं का 16 दिनों का एक पवित्र समय है, जो पूर्वजों के सम्मान और उनसे जुड़े अनुष्ठानों (श्राद्ध, तर्पण और पिंड दान) को करने के लिए समर्पित है. इस साल 26 सितंबर से पितृ पक्ष की शुरुआत हो रही है. बिहार के गयाजी, उत्तर प्रदेश के वाराणसी और उत्तराखंड के हरिद्वार की तरह कृष्णनगरी मथुरा में भी पितृ पक्ष पर दूरदराज से लोग पिंडदान के लिए आते हैं.
मथुरा में मणिपुर के वैष्णवों की अनूठी आस्था है. ब्रज भूमि और पूर्वोत्तर के राज्य मणिपुर का धार्मिक व सांस्कृतिक संबंध सदियों पुराना है. मणिपुर के वैष्णव श्रद्धालुओं के लिए गोवर्धन का राधा कुंड और शिव कुंड केवल दर्शन-पूजन का केंद्र नहीं बल्कि पूर्वजों के मोक्ष और अंतिम संस्कारों की अगाध आस्था का मुख्य धाम है. मणिपुरी समाज की कई पीढ़ियों पुरानी यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है.
मणिपुर के वैष्णव समाज में पितृ पक्ष (अश्विन मास) अथवा सामान्य दिनों में अपने पूर्वजों व पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान व तर्पण करने का विशेष विधान है. मणिपुरी भाषा में तर्पण को ‘तर्पों’ कहा जाता है. मणिपुर के श्रद्धालु बिहार के गयाजी की भांति ही राधा कुंड को पितृ शांति और नित्य धाम की प्राप्ति का परम पवित्र स्थल मानते हैं. मान्यता है कि राधा कुंड के पावन जल में भक्तिपूर्वक तर्पण व पूजन करने से पितरों को श्री राधा-कृष्ण के चरण कमलों में स्थान प्राप्त होता है.
गोवर्धन परिक्रमा मार्ग पर राधा कुंड क्षेत्र के समीप स्थित शिव कुंड (जहां भगवान शिव सिद्धेश्वर स्वरूप में विराजमान हैं) का मणिपुरी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आध्यात्मिक महत्व है. शास्त्रों में भगवान शिव को ‘वैष्णवानां यथा शंभु:’ यानी वैष्णवों का परम गुरु माना गया है.
इसी मान्यता के तहत मणिपुर में किसी परिजन के देहावसान के बाद उनकी अस्थियों का कुछ अंश गंगाजी में और कुछ अंश ब्रज के इस पवित्र शिव कुंड या मानसी गंगा व राधा कुंड के समीपस्थ कुंडों में विसर्जित किया जाता है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि भगवान शिव की कृपा से दिवंगत आत्मा को संसार चक्र से मुक्ति मिल जाती है.
18वीं शताब्दी में मणिपुर के राजा महाराज भाग्यचंद्र (जय सिंह) की ओर से गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय अपनाने के बाद से ही मणिपुर का ब्रज धाम से गहरा नाता जुड़ा. राधा कुंड स्थित ‘गोपाल मणिपुरी मंदिर’ और प्राचीन समाधि स्थल आज भी इस ऐतिहासिक व सांस्कृतिक रिश्ते की गवाही देते हैं. आज भी बड़ी संख्या में मणिपुर से श्रद्धालु अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में ब्रजवास करने और पूर्वजों के मोक्ष की कामना लेकर यहां पहुंचते हैं.
मथुरा के एक स्थानीय नागरिक दीपू जोशी ने को बताया कि मणिपुर के लोग अपने परिवार के किसी सदस्य के निधन के बाद अस्थियां यहां (राधा कुंड या शिव कुंड) लेकर आते हैं. यहां वे पीपल के पेड़ के नीचे वे अस्थियों को गाड़कर जाते हैं और पीपल के पेड़ पर एक पीला कपड़ा भी बांधकर जाते हैं. उन लोगों के लिए यही गयाजी होता है और राधाकुंड पर श्राद्ध करते हैं.
तीर्थ पुरोहित भूपेंद्र गोस्वामी ने को बताया कि वह मणिपुर राज्य के पुरोहित हैं. उन्होंने कहा कि यहां राधाकुंड के पास मणिपुर के लोग आते हैं. वे यहां पिंडदान और तर्पण करते हैं. वे लोग पीपल के एक पेड़ के पास अस्थियों को विसर्जित करते हैं. इसके बाद राधाकुंड में स्नान करके ये लोग मंदिर में ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं.
मणिपुर के निवासी गोदाधोर सिंह ने कहा कि हमारे यहां परिवार के किसी सदस्य का निधन होने के बाद उनकी अस्थियों को मथुरा के राधाकुंड लाया जाता है. उन्होंने कहा कि कुछ लोग वाराणसी, प्रयागराज या हरिद्वार जाते हैं लेकिन अधिकतर लोग राधाकुंड आकर पिंडदान करते हैं.
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डीसीएच/पीएम