
कोलकाता, 8 अक्टूबर . देशभर में धूमधाम से नवरात्र की तैयारी की जा रही है. इस वर्ष 11 अक्टूबर को नवरात्र का शुभारंभ होगा और 19 अक्टूबर को समापन होगा. इस अवसर पर देवी की पूजा की जाती है. बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां के मंदिरों में जाकर उनके दर्शन कर पूजन-अर्चन करते हैं. पश्चिम बंगाल में माता के सबसे अधिक शक्तिपीठ हैं, जहां बड़ी श्रद्धा के साथ श्रद्धालु मां के दर्शन करने जाते हैं.
पूर्व मेदिनीपुर जिले के तामलुक में देवी कपालिनी का मंदिर है. यहां माता सती की बायीं एड़ी गिरी थी. यहां मां को भीमरूपा (वर्गा भीमा) के रूप में पूजा जाता है. यहां भगवान शिव ‘सर्वानंद’ रूप में विराजमान हैं. ‘कपालिनी’ का अर्थ मुंड है कि वह जो मुंड या कपाल (खप्पर) धारण करती हैं. मां कपालिनी की उपासना से भक्तों को साहस, शक्ति, और सभी प्रकार के भय, संकट तथा नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है.
हुगली जिले के रत्नावली शक्तिपीठ में मां देवी कुमारी का मंदिर है. यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है. यहां माता सती का दायां कंधा गिरा था. यहां मां को ‘कुमारी’ या ‘आनंदमयी’ नाम से पूजा जाता है. यहां भगवान शिव ‘भैरव’ के रूप में विराजमान हैं.
मुर्शीदाबाद जिले के किरीटकोण ग्राम में किरीटेश्वरी शक्तिपीठ है, यहां मां विमला देवी का मंदिर है. यहां देवी सती का मुकुट गिरा था. इस शक्तिपीठ के साथ भगवान शिव का संभर्ध्व (संर्त) या काल भैरव रूप जुड़ा हुआ माना जाता है. विमला देवी का बीज मंत्र ‘ॐ ह्रीं विमलायै नमः’ है.
जलपाईगुड़ी जिले के बोडा मंडल में सालबाढ़ी गांव में मां भ्रामरी देवी का मंदिर है. यहां देवी सती का बायां पैर गिरा था. यह 51 शक्तिपीठों में से एक है. यहां देवी ‘भ्रामरी’ और उनके साथ भैरव ‘ईश्वर’ स्वरूप में विराजमान हैं. तीस्ता नदी के घने जंगलों के बीच मां भ्रामरी का शांत मंदिर है. मां भ्रामरी को कालिका या भद्रकाली का ही उग्र एवं करुणामय स्वरूप माना गया है, जो काले रंग की भ्रमरों (मधुमक्खियों) से घिरी रहती हैं.
वर्धमान जिले के केतुग्राम इलाके में बहुला देवी शक्तिपीठ है. यहां माता सती का बायां हाथ गिरा था. इस शक्तिपीठ में माता सती की पूजा ‘मां बहुला’ के रूप में और भगवान शिव की पूजा उनके ‘भीरुक’ (सर्वसिद्धिदायक) भैरव रूप में की जाती है. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से पूजा करने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और उन्हें असीम शांति व समृद्धि मिलती है.
वर्धमान जिले के उजानी गांव में मंगल चंद्रिका माता शक्तिपीठ है. यहां देवी सती का दाहिनी कलाई (या हाथ का हिस्सा) गिरी थी. इस शक्ति पीठ में मां दुर्गा के स्वरूप देवी ‘मंगल चंडी’ की पूजा की जाती है, और यहां के भैरव (शिव) को ‘कपिलांबर’ कहा जाता है. मान्यता है कि देवी मंगल चंद्रिका की आराधना से घर-परिवार में सुख-शांति, समृद्धि, उन्नति और सभी प्रकार के संकटों से रक्षा होती है. यहां तांत्रिक साधना और विशेष अनुष्ठान भी किए जाते हैं.
पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में पापहर नदी के तट पर स्थित 51 शक्तिपीठों में से एक वक्रेश्वर शक्तिपीठ है. यहां देवी सती का भ्रूमध्य यानी भौंहों के बीच का भाग या उनका ‘मन’ गिरा था. यहां मां को ‘महिषासुरमर्दिनी’ और भगवान शिव को ‘वक्रनाथ’ के रूप में पूजा जाता है.
बीरभूम के नलहाटी में स्थित नलहाटी शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में से एक है. यहां देवी सती का कंठ (गला) या उदर नली गिरी थी. यहां मां को ‘कालिका’ और भैरव की ‘योगीश’ रूप में पूजा की जाती है. मन्दिर के गर्भगृह में माता के मुख के ठीक नीचे कंठ (नाला) का स्थान है. यहां एक अनोखी मान्यता है कि माता के गले में कितना भी जल अर्पित किया जाए, वह न तो कभी भरता है और न ही सूखता है, बल्कि जल निगलने जैसी आवाज सुनाई देती है.
बीरभूम जिले के लाभपुर के पास फुल्लारा देवी शक्तिपीठ है. 51 शक्तिपीठों में से एक इस शक्तिपीठ को अट्टहास शक्तिपीठ भी कहा जाता है. यहां माता सती का निचला होठ गिरा था. यहां माता को ‘फुल्लरा’ और भगवान शिव ‘विश्वेश’ के रूप में पूजा जाता है. इस मंदिर में मूर्ति के स्थान पर लगभग 15 से 18 फीट लंबी एक विशाल प्राकृतिक शिला (पत्थर) की पूजा की जाती है, जिसे माता का स्वरूप माना जाता है.
वीरभूम जिले में सैंथिया शहर में स्थित नंदीपुर शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में से एक है. यहां देवी सती का कंठहार (गले का हार) गिरा था. इस मंदिर में माता सती को ‘नंदिनी’ और भगवान शिव को ‘नंदिकेश्वर’ (भैरव) के रूप में पूजा जाता है. यहां मां की मूर्ति एक बड़े वटवृक्ष के नीचे कछुए के आकार की सिंदूर लेपित चट्टान के रूप में विद्यमान है, जिस पर चांदी का मुकुट और सोने की तीन आंखें सुशोभित हैं.
वर्धमान जिले के क्षीरग्राम में युगाधा शक्तिपीठ स्थित है. यहां देवी सती का दाहिने पैर का अंगूठा गिरा था. यहां की अधिष्ठात्री (मुख्य) देवी को ‘युगाद्या’ (भूतधात्री) और भगवान शिव (भैरव) को ‘क्षीर कंठक’ (क्षीरखंडक) के रूप में पूजा जाता है. मान्यता है कि देवी की असली प्रतिमा मंदिर के पास स्थित ‘क्षीरडिघी’ नामक पवित्र तालाब के जल में निवास करती है.
कोलकाता में स्थित कालीघाट शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध धाम है. यहां माता सती के दाएं पैर का अंगूठा गिरा था. यहां देवी को ‘कालिका’ और भैरव को ‘नकुशील’ (नकुलेश्वर) के रूप में पूजा जाता है. यहां मां कालिका की अनूठी प्रतिमा स्थापित है, जिसके तीन विशाल नेत्र, चार हाथ और सोने से मढ़ी हुई लंबी प्रस्फुटन यानी जीभ हैं. माता के हाथों में खड्ग (तलवार) और असुर का कटा हुआ सिर सुशोभित है. यह स्थान आम भक्तों की आस्था के साथ-साथ तांत्रिक साधना के लिए भी बहुत शक्तिशाली केंद्र माना जाता है.
बीरभूम जिले में बोलपुर के पास कोपई नदी के तट पर स्थित कांची देवगर्भ शक्तिपीठ (कंकालिता मंदिर) 51 शक्तिपीठों में से एक है. यहां देवी की कमर या कंकाल गिरा था. यहां देवी को ‘देवगर्भा’ और भगवान शिव (भैरव) को ‘रुरु’ कहा जाता है. यह शक्तिपीठ तंत्र-मंत्र और साधना के लिए भी बहुत प्रसिद्ध माना जाता है. मंदिर के पास ही श्मशान घाट है जहां कई साधकों और तांत्रिकों ने सिद्धि प्राप्त की है.
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एसडी/पीएम